हुती विद्रोहियों द्वारा लाल सागर एवं अरब सागर में व्यापारिक जहाजों पर हो रहे हमले के बीच विदेश मंत्री एस जयशंकर की ईरान यात्रा कूटनीतिक एवं सामरिक दोनों ही दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण रही। जयशंकर की यात्रा से पहले अमरीका तथा ब्रिटेन ने अपने अन्य सहयोगी देशों के समर्थन से यमन स्थित हुती विद्रोहियों के ठिकाने पर बमबारी की, जिसमें काफी नुकसान हुआ है। इससे पहले लाल सागर एवं अरब सागर में भारत के दो जहाजों पर भी हुती विद्रोहियों ने हमला किया था। भारत ने अपने यहां आने वाले व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा के लिए लाल सागर एवं अरब सागर में अपने पांच युद्ध पोतों सहित 12 से ज्यादा जहाजों को भेज दिया है। आईएनएस चेन्नई, आईएनएस कोलकाता, आईएनएस विशाखापत्तनम, आईएनएस कोच्चि एवं आईएनएस मोर मोगायो जैसे युद्ध पोतों को तैनात कर दिया है। इन युद्ध पोतों पर ब्रह्मोस एवं बराक जैसी मिसाइल लगी हुई है जो मिनटों में दुश्मन को नेस्तनाबूद करने में सक्षम है।
इसके अलावा पी-8आई निगरानी विमान एवं खतरनाक ड्रोन लगातार गश्ती कर रहे हैं। मालूम हो कि एशिया को यूरोप से जोडऩे के लिए लाल सागर एवं स्वेज नहर का मार्ग सबसे व्यावहारिक है। स्वेज नहर से दुनिया का लगभग 30 प्रतिशत व्यापार होता है, जिसमें काफी गिरावट आई है। भारत का भी यूरोप को होने वाला निर्यात तथा खाड़ी देशों से आने वाला कच्चा तेल इसी मार्ग से आता है। भारत ने अपने व्यापार को सुरक्षित करने के लिए लाल सागर एवं अरब सागर क्षेत्र में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। बंगाल की खाड़ी में भी भारत ने जापान के साथ संयुक्त नौसेना अभ्यास कर अपनी स्थिति और मजबूत की है। यह सबको मालूम है कि हुती विद्रोहियों को ईरान से सहयोग एवं समर्थन मिलता रहा है। हुती विद्रोहियों के पास ईरानी हथियार, ड्रोन एवं अन्य साजो-सामान उपलब्ध हैं। ईरान से हुती विद्रोहियों को राजनीतिक संरक्षण भी मिलता रहा है। भारत और ईरान के बीच अच्छे संबंध रहे हैं।
भारत ईरान के चाबहार बंदरगाह को विकसित कर रहा है। इसके अलावा नार्थ-ईस्ट कॉरिडोर को विकसित करने में भारत ईरान के साथ काम कर रहा है। ऐसी स्थिति में जयशंकर की ईरान यात्रा से दुनिया को यह उम्मीद बंधी है कि शायद लाल सागर एवं अरब सागर में हुती विद्रोहियों पर अंकुश लगाने के लिए निश्चित रूप से कोई ठोस उपाय होंगे। अगर ऐसा नहीं हुआ तो अमरीका एवं उसके सहयोगी देश हुतियों पर जबर्दस्त बमबारी करेंगे जिसकी आंच निश्चित रूप से ईरान तक पहुंचेगी। इजरायल-हमास युद्ध के कारण पहले ही मध्य-पूर्व अस्थिर हो चुका है। इजरायल फलिस्तीन के साथ-साथ लेबनान भी युद्ध की चपेट में आ गया है। उम्मीद है कि जयशंकर की ईरान यात्रा से हुती विद्रोहियों के हमले बंद होंगे। लगातार हमले के कारण व्यापारिक जहाजों की लागत 20 प्रतिशत तक बढ़ रही है जो दुनिया की अर्थ-व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है। आपसी टकराव का असर व्यापारिक जहाजों पर नहीं पड़ना चाहिए।