लाल सागर में ईरान समर्थित आतंकवादियों के हमलों ने दुनिया के अधिकांश कंटेनर जहाजों और जहाजों के लिए दुनिया के मुख्य व्यापार मार्गों में से एक को प्रभावी ढंग से बंद कर दिया है, जिससे लगभग हर जरूरी वस्तुओं को दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक ले जाये जाते हैं। जलमार्ग का लंबे समय तक बंद रहना, जो स्वेज नहर से जुड़ता है, वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं को बाधित कर सकता है और मुद्रास्फीति को बढ़ा सकता है।  उल्लेखनीय है कि स्वेज नहर विश्व व्यापार का 10-15 प्रतिशत हिस्सा है, जिसमें निर्यात और वैश्विक कंटेनर शिपिंग मात्रा का 30 प्रतिशत शामिल है। दूसरी ओर यमन स्थित हूती आतंकवादियों का कहना है कि वे गाजा में हमास के खिलाफ इजरायल के युद्ध का बदला ले रहे हैं। अमरीकी सेना और उसके सहयोगियों ने समुद्री सुरक्षा बढ़ा दी है, लेकिन हमले जारी हैं। जैसे-जैसे संकट बढ़ रहा है, वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए जोखिम बढ़ रहा है। खुदरा विक्रेता पहले से ही देरी की चेतावनी दे रहे हैं और माल की शिपिंग की लागत बढ़ रही है। एक द्विवार्षिक रिपोर्ट में विश्व बैंक ने चेतावनी दी कि प्रमुख शिपिंग मार्गों में व्यवधान से आपूर्ति नेटवर्क में सुस्ती आ रही है और मुद्रास्फीति संबंधी बाधाओं की संभावना बढ़ रही है।

फिलहाल लाल सागर में स्वेज नहर के जरिए वाणिज्यिक पोतों के आवागमन पर मंडरा रहे संकट समाप्त होने का कोई संकेत फिलहाल नजर नहीं आ रहा है। यह भूमध्यसागर और हिंद-प्रशांत क्षेत्र को जोडऩे वाला एक अहम मार्ग है और गाजा पट्टी तथा उसके आसपास के इलाकों में इजरायल-हमास जंग के कारण इसे लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है।हूती विद्रोही गठबंधन हथियारों से अच्छी तरह लैस है। उसने पोतरोधी बैलिस्टिक मिसाइलों का इस्तेमाल किया है। इससे पहले किसी लड़ाई में इतनी बड़ी तादाद में इनका इस्तेमाल नहीं किया गया था। इनके साथ ही विद्रोहियों ने क्रूज मिसाइलों, ड्रोन और छोटी नौकाओं का उपयोग करके भी जहाजों पर हमला किया और उन्हें धमकाया। हूती विद्रोहियों का दावा है कि उन्होंने इजरायल की ओर जा रहे पोतों पर हमले किए, लेकिन वास्तव में यह सच नहीं है। यह संभव ही नहीं है कि वे जान सकें कि कौन-सा जहाज किस दिशा में जा रहा है। इन हमलों के परिणामस्वरूप कई प्रमुख पोत संचालकों ने स्वेज नहर और लाल सागर का मार्ग छोड़ देने का निर्णय लिया। ऐसे निर्णयों के परिणामस्वरूप भूमध्यसागर और हिंद-प्रशांत क्षेत्र के बीच नौवहन में लगने वाला समय और व्यय बहुत अधिक बढ़ गया है। तमाम पोत अपनी यात्राओं को स्थगित कर रहे हैं और अगर उन्हें यात्रा करनी ही पड़ रही है तो वे दक्षिण अफ्रीका में आशा अंतरीप के रास्ते से आवागमन कर रहे हैं।

भारत के औद्योगिक संगठनों के हालिया अनुमानों के मुताबिक यूरोप तक पोत भेजने की लागत 70 फीसदी से 200 फीसदी तक बढ़ गई है। विभिन्न प्रमुख क्षेत्रों में भारत के निर्यात की बात करें तो इसका असर उनके मार्जिन और उनकी प्रतिस्पर्धी क्षमता पर पड़ सकता है। भारत के पूर्वी तटों में से एक से निकला डीजल और जेट फ्यूल कार्गो पोत पहले ही विलंब से चल रहा है और उसकी दिशा बदल दी गई है। अन्य वैश्विक एकीकरण वाले क्षेत्रों पर भी असर पड़ सकता है। वैश्विक अर्थव्यवस्था और साथ ही 2023-24 में भारत की अप्रत्याशित रूप से मजबूत वृद्धि के लिए भी लाल सागर के हालात निकट भविष्य में सर्वाधिक अनिश्चितता वाले हालात बने रहने वाले हैं। पोतों के आवागमन का इस तरह बाधित होना आर्थिक सुधार की प्रक्रिया को गहरी क्षति पहुंचाने वाला साबित होगा। यह मुद्रास्फीति के लिए भी बड़ा जोखिम साबित हो सकता है। इस संदर्भ में यह बात ध्यान देने लायक है कि अब जबकि स्वेज नहर के रास्ते का इस्तेमाल मुश्किल हो रहा है तो इसी बीच अमरीका में इसकी जुड़वां नहर को भी वर्षों या दशकों में सबसे कम नौवहन के लिए विवश किया गया है। ऐसा इसलिए क्योंकि जलवायु परिवर्तन के कारण सूखे की स्थिति बढ़ी है जिसके चलते वहां से गुजरना मुश्किल हुआ है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि स्थिति भयावह है। ऐसी स्थिति में सबसे पहले इजरायल की ओर से गाजा पर आक्रमण रोके जाने की जरूरत है ताकि जल्द से जल्द लाल सागर का भी संकट दूर हो सके।