बांग्लादेश में हुए चुनाव पर पूरी दुनिया की नजर लगी हुई थी। इस चुनाव का असर भारत सहित दक्षिण एशिया पर पडऩे वाला है। खासकर भारत के लिए शेख हसीना की वापसी बहुत जरूरी थी। 300 सदस्यीय बांग्लादेशी संसद के लिए हुए चुनाव में शेख हसीना की अवामी लीग पार्टी को भारी बहुमत मिली है। 300 में से कुल 299 सीटों पर मतदान हुए थे, क्योंकि एक उम्मीदवार की मौत के कारण एक सीट पर चुनाव स्थगित हो गया था। निर्दलीयों को सबसे ज्यादा 62 सीटें मिली हैं, जबकि जातीय पार्टी को 11, बांग्लादेश कल्याण पार्टी को 1, एक अन्य क्षेत्रीय पार्टी को 1 एवं बांग्लादेश वर्कर पार्टी को 1 सीट मिली है। वहां की मुख्य विपक्षी पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने इस चुनाव का बहिष्कार कर रखा था। बीएनपी की प्रमुख खालिदा जिया अभी जेल में हैं। बीएनपी की मांग थी कि कार्यवाहक सरकार की देखरेख में राष्ट्रीय चुनाव कराया जाए, लेकिन हसीना सरकार इसके लिए तैयार नहीं थी। यही कारण है कि बीएनपी के नेताओं एवं कार्यकर्ताओं ने चुनाव कराने के फैसले के खिलाफ आंदोलन छेड़ रखा था। भारत ने भी अपना तीन सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल चुनाव पर निगरानी के लिए बांग्लादेश भेजा था।  सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बहिष्कार के बावजूद 40 प्रतिशत मतदान हुआ। बीएनपी ने वर्ष 2014 में भी मतदान का बहिष्कार कर रखा था।

बीएनपी के साथ-साथ 14 और पाॢटयों ने चुनाव के खिलाफ आंदोलन चला रखा था। शेख हसीना चौथी बार जीत कर बांग्लादेश की सत्ता पर काबिज होगी। लेकिन देश की संसद में पहली बार मजबूत विपक्ष नहीं होगा। वर्ष 2009 से ही हसीना बांग्लादेश में शासन कर रही है जो भारत के लिए अच्छा है। भारत और चीन ने बांग्लादेश के चुनाव पर संतोष व्यक्त किया है और कहा है कि ङ्क्षहसामुक्त मतदान होना अच्छी बात है, लेकिन अमरीका सहित कुछ पश्चिमी देश इस मतदान पर सवाल उठा रहे हैं। अमरीका का कहना है कि बांग्लादेश में लोकतंत्र को दबाया गया है एवं मानवाधिकारों का हनन हो रहा है। लेकिन भारत चाहता था कि शेख हसीना दोबारा जीत कर सत्ता में आए। हसीना ने भारत को अपना घनिष्ठ मित्र बताया है। उनके शासन में सीमा विवाद की प्रमुख समस्याओं को हल कर लिया गया है। इसके अलावा सड़क, रेल एवं जलमार्ग के क्षेत्र में काफी प्रगति हुई है। पिछले 10 वर्षों के दौरान बांग्लादेश में भारत की तरफ से काफी निवेश बढ़ा है। शेख हसीना ने स्वीकार किया है कि 1971 एवं 1975 में भारत ने विकट समय में बांग्लादेश का पूरा समर्थन किया था। हसीना ने भारत और चीन के बीच संतुलन बना रखा है। यही कारण है कि भारत और चीन दोनों ने ही हसीना की वापसी का समर्थन किया है। मालदीव के मुद्दे पर भी हसीना ने विवादित टिप्पणी के लिए मालदीव को फटकार लगाई है।

हसीना के सत्ता में आने के बाद बांग्लादेश में आतंकियों एवं कट्टरपंथियों की गतिविधियों में कमी आई है। इसका सकारात्मक प्रभाव पूर्वोत्तर क्षेत्र पर भी पड़ा है। खालिदा जिया के शासन में बांग्लादेश में अंसार बांग्ला टीम (एबीटी) जेएमबी एवं न्यू जेएमबी जैसे खतरनाक आतंकी संगठन सक्रिय थे। एबीटी अलकायदा जैसे खतरनाक आतंकी संगठन का हिस्सा है, जबकि न्यू जेएमबी आईएस का। इसके अलावा भारत विरोधी और कई कट्टर आतंकी संगठन वहां सक्रिय हैं। शेख हसीना के शासन में ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई भी हुई है, जिसके कारण इनकी गतिविधियों में कमी आई है। बांग्लादेश की सरकार ने पूर्वोत्तर में सक्रिय कई आतंकियों को पकड़ कर भारत के हवाले भी किया है। ऐसी स्थिति में शेख हसीना की सरकार के पुन: लौटने से भारत सरकार के साथ-साथ सुरक्षा एजेंसियों ने भी राहत की सांस ली है। आतंकी गतिविधियों के बारे में भारत और बांग्लादेश की सुरक्षा एजेंसियों के बीच फिलहाल बेहतर तालमेल है। अवामी लीग की सरकार रहने से पाकिस्तानी गुप्तचर एजेंसी आईएसआई को भी यहां खुलकर भारत विरोधी गतिविधियां चलाने की इजाजत नहीं मिलेगी। कुछ वर्षों में दोनों के बीच व्यापार भी बढ़ा है, जो अच्छा संकेत है। भारत अपने पड़ोसियों के साथ हमेशा से बेहतर संबंध बनाने पर काम करता है, ङ्क्षकतु कुछ देश चीन के बहकावे में आकर ड्रैगन के एजेंडे पर काम करने लग जाते हैं।