कई दशकों से वैज्ञानिकों की यह धारणा बन रही थी कि पृथ्वी का वायुमंडल सिकुड़ रहा है। नए अध्ययनों में इस बात की पुष्टि भी हुई है कि यह सच है और अब इसे अवलोकित भी कर लिया गया है। अब इसके प्रभाव के रूप में माना जा रहा है कि इसका जिम्मेदार जलवायु परिवर्तन है और वायुमंडल में बढ़ते कार्बन डाइऑक्साइड के कारण अंतरिक्ष में सैटेलाइट की वजह से बढ़ता जा रहा कचरा साफ करने के प्रयासों पर भी बुरा असर पडऩा तय माना जा रहा है। नासा के पिछले 20 साल के आंकड़ों से वैज्ञानिकों ने ऊपरी वायुमंडल के बदालवों का अध्ययन कर पाया है कि कई जगहों पर इसका संकुचन स्थाई हो गया है।
स्थायी या अस्थायी संकुचन : दो दशकों से वैज्ञानिकों को लग रहा था कि वायुमंडल का संकुचन हो रहा है। दो नए अध्ययनों के मुताबिक ऊपरी वायुमंडल के इस संकुचित होने में ग्रीनहाउस गैसों की बड़ी भूमिका है। जहां कई जगह यह संकुचन सामान्य ही है और वापस ऊपरी परतें अपने पुराने स्वरूप में वापस आ सकती हैं, वैज्ञानिकों का लगता है कि कुछ यह बदलाव शायद स्थायी ही हो गया है।
कचरे की समस्या होगी गंभीर : इस तरह के संकुचन का मतलब यही है कि बंद या खराब हो चुके सैटेलाइट और पुरानी तकनीक वाले पृथ्वी की निचली कक्षा के सैटेलाइट अब लंबे समय तक अपनी स्थिति में बने रहेंगे। इसकी वजह यह है कि पहले ये कचरा पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल से देर सबेर टकरा कर जल जाता था लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। जिससे अंतरिक्ष के कचरे की समस्या गंभीर हो जाएगी।
ऊंचाई पर जाएंगे सैटेलाइट : नासा के लैंगले रिसर्च सेंटर के जियोस्पेस वैज्ञानिक मार्टिन म्लिनार्कजैक का कहना है कि इसका एक नतीजा यही होगा कि अब सैटालाइट ऊंचाई पर ज्यादा रहेंगे क्योंक लोग भी अपने सैटेलाइट को ज्यादा ऊंचाई पर चाहते हैं। लेकिन इससे अंतरिक्ष का कचरा भी ऊंचाई पर रहेगा और उससे यह संभावना भी बढ़ सकती है कि सैटेलाइट आदि को टकराव से बचने के लिए अपने रास्तों का बार-बार समायोजित करना होगा।
सूर्य की भूमिका?
जब भी वायुमंडल की परतों की व्याख्या की जाती है तो हर परत को एक खास ऊंचाई तक और उसकी एक खास मोटाई का बताया जाता है, जबकि हकीकत यह है ये ऊंचाइयां स्थिर नही हैं। वायुमंडल में गैसे फैलती और संकुचित होती हैं। इसका सबसे बड़ा कारण सूर्य होता है। सूर्य के हर 11 साल में चलने वाला चक्र की गतिविधियां पृथ्वी को प्रभावित करती हैं।