विदेश मंत्री एस जयशंकर की पांच दिवसीय रूस यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच हथियारों के संयुक्त उत्पादन, परमाणु समझौते एवं व्यापार बढ़ाने के मुद्दे पर विस्तार से चर्चा हुई। भारत में एक और न्यूक्लियर प्लांट लगाने सहित कई मुद्दों पर दोनों देशों के बीच समझौता हुआ। रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावारोव के साथ जयशंकर की द्विपक्षीय बैठक हुई। सबसे बड़ी बात यह है कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन ने तमाम प्रोटोकॉल को तोड़ते हुए भारतीय विदेश मंत्री के साथ मुलाकात की। जयशंकर ने प्रधानमंत्री द्वारा भेजा हुआ पत्र पुतिन को सौंपा। पुतिन ने प्रधानमंत्री मोदी को रूस यात्रा के लिए आमंत्रित किया जिसे स्वीकार कर लिया गया है। जयशंकर का यह बयान दुनिया की मीडिया में चर्चा का विषय बना हुआ है, जिसमें कहा गया है कि विश्व में सिर्फ भारत और रूस के रिश्ते ही स्थिर हैं। उन्होंने कहा कि मिलिट्री, अंतरिक्ष एवं न्यूक्लियर ऊर्जा के मामले में सिर्फ उसी देश के साथ साझेदारी करते हैं जिस पर हमें पूरा भरोसा होता है। कई दशकों से भारत एवं रूस के रिश्ते एक समान बने हुए हैं। पिछले 70 वर्षों के दौरान दुनिया में बड़े-बड़े बदलाव आए, लेकिन भारत और रूस के रिश्तों में कोई बदलाव नहीं आया।

रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद दोनों देशों के रिश्ते कसौटी पर थे, किंतु अमरीका सहित पश्चिमी देशों के दबाव के बावजूद भारत और रूस के संबंध पूर्ववत बने रहे। सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस ने उसकी जगह ली। भारत द्वारा यूक्रेन युद्ध के दौरान रूस से रियायती दर पर कच्चे तेल की खरीद की गई जिससे रूस की अर्थ व्यवस्था पश्चिमी देशों के प्रतिबंध के बावजूद संतुलित रही। अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिक दृष्टिकोण से भी जयशंकर की रूस यात्रा काफी महत्वपूर्ण रही। अमरीका भारत को रूस से अलग कर पूरी तरह अपने खेमे में लाना चाहता है, किंतु भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति को बरकरार रखते हुए रूस और अमरीका के बीच संतुलन बनाए हुए है। रूस से भारत को अलग करने के लिए अमरीका ने हाल ही में खालिस्तानी आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू की हत्या का षड्यंत्र रचने का आरोप एक भारतीय नागरिक पर लगाकर दबाव डालने का प्रयास किया था। अमरीकी गुप्तचर एजेंसी एफबीआई के प्रमुख का भारत दौरा हुआ था। उस दौरान भारत ने अमरीकी दबाव को धत्ता बताते हुए उन खालिस्तानियों की सूची अमरीका को पकड़ा दी जो अमरीका में भारत विरोधी गतिविधियों में संलग्न हैं।

पन्नू को लेकर भारत और अमरीका के रिश्तों के बीच तल्खी आ गई है। इससे पहले अमरीका के ही इशारे पर कनाडा ने खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में भारतीय एजेंसियों के शामिल होने का आरोप लगाया था। उस दौरान भारत ने कनाडा की दुमुंही नीति का पर्दाफाश करते हुए कनाडा पर भारत विरोधी तत्वों को सहायता एवं संरक्षण देने का सबूत के साथ आरोप लगाया। उस वक्त अमरीका ने कनाडा के समर्थन में खुलकर कुछ नहीं कहा, किंतु पर्दे के पीछे अमरीका इस काम के लिए कनाडा को प्रोत्साहित कर रहा था। हमास-इजरायल युद्ध के दौरान भी भारत ने अमरीका और पश्चिमी देशों से हटकर स्वतंत्र नीति अपनाई जिससे अमरीका को झटका लगा है। इसी दौरान पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष मुनीर का अमरीका दौरा दोनों देशों के बीच दूरियां बढ़ाने के लिए काफी रहा। रूस का दौरा कर जयशंकर ने अमरीका को कूटनीतिक संकेत देने का प्रयास किया है कि हम जरुरत पड़ने पर रूसी खेमे में जाने से परहेज नहीं करेंगे।

अमरीका एक ऐसा देश है जिस पर विश्वास नहीं किया जा सकता है। अमरीका से दोस्ती लाभ-हानि के आधार पर निर्धारित होती है। इतिहास गवाह है कि जब अमरीका को यह लगता है कि संबंधित देश से दोस्ती उसके हित में नहीं है तो वह उसे दरकिनार कर देता है। भारत इस वास्तविकता को भलिभांति समझता है। यही कारण है कि भारत किसी भी परिस्थिति में रूस के साथ अपनी दोस्ती की चमक कम नहीं होने दे रहा है। भारत की ही तरह रूस को भी भारत का साथ चाहिए, ताकि वह पश्चिमी प्रतिबंधों का मुकाबला कर सके। रूस के साथ समस्या यह है कि उसे भारत और चीन के बीच संतुलन बनाए रखने की मजबूरी है। भारत अपनी सामरिक शक्ति को इतना मजबूत करना चाहता है ताकि उसे चीन के मुकाबले के लिए किसी देश से सैनिक सहायता की जरुरत न पड़े। भारत और रूस की दोस्ती को किसी तीसरी शक्ति द्वारा कमजोर नहीं किया जा सकता।