जैसलमेर के धोलिया निवासी राधेश्याम पेमाणी विश्नोई ने पर्यावरण संरक्षण व जीव जंतुओं के सरंक्षण का बीड़ा इस तरह उठाया है कि हर कोई दंग रह जाता है। कोई पक्षी या वन्यजीव घायल हो या बीमार, उसका रेस्क्यू करना हो तो पूरे क्षेत्र में राधेश्याम का नाम सभी की जुबान पर रहता है। कुछ लोगों के पास उनसे संपर्क करने के लिए नंबर भी होता है, पर अगर आपके पास नहीं है, तो यहां हम आपको उपलब्ध करवा रहे हैं। जैसलमेर के पोकरण के एक गांव में रहने वाले राधेश्याम किसी जीव या पक्षी को बचाने के लिए यह नहीं देखते कि कितनी दूर जाना है। विश्नोई समाज में हिरण और गाय को अतिप्रिय समझा जाता है और धोलिया के राधेश्याम ने इन्हीं के सरंक्षण व सेवा हेतु अपना जीवन समर्पित कर दिया। भारत के अधिकांश लुप्तप्राय: जंतु व पशु पक्षी जैसलमेर में ही हैं। लेकिन बढ़ती आवाजाही और विकास कार्यों के कारण इनका अस्तित्व खत्म होने की कगार पर है लेकिन राधेश्याम इनके संरक्षण के लिए अपना काम कर रहे हैं। राधेश्याम जैसलमेर जिले के रामगढ़, तनोट और कई जगहों पर गोडावण व घायल वन्य जीवों के सरंक्षण व उपचार के लिए एक फोन पर खुद के खर्चे पर चले जाते हैं। किसी जीव को बचाने के लिए आप उन्हें 80945 18231 नंबर पर कॉल कर सकते हैं।
पर्यावरण संरक्षण के पर्याय बन गए हैं राधेश्याम : वन्य जीवों के रेस्कयू व उपचार में कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। उपचार के बाद इनके जिंदा बचने की संभावनाएं कम रह जाती थी। इस समस्या का समाधान ढूंढने के लिए विश्नोई ने जोधपुर में पशु चिकित्सकों से टिप्स लिए और माचिया बायोलॉजिकल पार्क से ट्रेनिंग। इसके बाद वन्य जीवों के सफल रेस्क्यू व इलाज के सफल होने के केस बढ़े। गौरतलब है कि बिश्नोई अथवा विश्नोई उत्तर पश्चिमी भारत के पश्चिमी राजस्थान का एक पर्यावरण प्रेमी समुदाय कहा जाता है। विश्नोई धर्म के संस्थापक जाम्भोजी महाराज के 29 नियमों का पालन करने वाले विश्नोई समाज का इतिहास भी समृद्ध है। जम्भेश्वर भगवान के 29 नियमों का सार ही यही है कि 'जीव दया पालणी, रूंख लीला नहीं घावे' राधेश्याम कहते हैं कि वह इसी सिद्धांत से प्रेरित होते हैं।