शिलांग : मेघालय में वर्ष 2023 के शुरुआती समय में चुनावी गहमागहमी रही और नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के समर्थन से सरकार बनाई। इसके साथ ही अंतर्राज्यीय सीमा मुद्दों, जातीय संघर्ष और आरक्षण नीति के संबंध में एक विधायक के अनशन को लेकर भी राज्य चर्चा में रहा। एनपीपी ने अपने युवा नेता कोनराड के संगमा के नेतृत्व में 60 सदस्यीय सदन में 26 सीट हासिल कीं, जो कि वर्ष 2018 के विधानसभा चुनावों की तुलना में सात अधिक हैं।

एनपीपी मई में उस समय और मजबूत हो गई, जब दो विधायकों के साथ पीपुल्स डेमोक्रेटिक फ्रंट (पीडीएफ) ने उनके साथ विलय कर लिया, जिससे सत्तारूढ़ पार्टी के विधायकों की संख्या 28 हो गई। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और शीर्ष केंद्रीय मंत्रियों के प्रचार करने के बावजूद भाजपा दो ही सीट जीत पाई थी। विपक्षी दल कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने पांच-पांच सीट हासिल की, जबकि नवगठित ‘वॉयस ऑफ द पीपल पार्टी’ (वीपीपी) ने चार सीट पर जीत दर्ज की थी।

नई सरकार के गठन के कुछ ही माह बाद ही वीपीपी प्रमुख अर्देंट बसाइवामोइत ने कोनराड के नेतृत्व वाली ‘मेघालय डेमोक्रेटिक अलायंस’ सरकार से 51 साल पुरानी आरक्षण नीति की समीक्षा के लिए एक विशेषज्ञ समिति गठित करने की मांग करते हुए अनशन शुरू कर दिया। उनका यह अनशन 200 घंटे से अधिक समय तक चला था। राज्य सरकार ने 1972 की नीति की समीक्षा के लिए एक समिति का गठन किया, जिसने नौकरियों में गारो को 40 प्रतिशत, खासी-जयंतिया जनजातियों को 40 प्रतिशत, अन्य जनजातियों को पांच प्रतिशत और सामान्य श्रेणी के उम्मीदवारों को 15 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया। संगमा ने शेष छह क्षेत्रों में पड़ोसी राज्य असम के साथ अंतर्राज्यीय सीमा मतभेद को सुलझाने के लिए क्षेत्रीय समितियों का भी पुनर्गठन किया।