बढ़ते समय के साथ विकसित होता समाज और बढ़ते शहरीकरण की वजह से प्रकृति को नुकसान पहुंचा है। सिर्फ प्रकृति को ही नहीं, बल्कि दूसरे जीव-जंतुओं, पशु-पक्षियों को भी हानि पहुंची है। इस आधुनिकता के दौर में भी कुछ लोग पर्यावरण को बचाने के लिए काम कर रहे हैं। आज हम लाए हैं ऐसे ही एक व्यक्ति की कहानी जिन्हें भारत में 'नेस्ट मैन' के नाम से जाना जाता है। जो 14 साल में अब तक लगभग 2 लाख 75 हजार से ज्यादा घोंसले बना चुके हैं। लोगों को पक्षियों के लिए आशियाने बनाने के लिए प्रेरित करते हैं और ट्रेनिंग भी देते हैं। आखिरकार कैसे दिल्ली मयूर विहार के रहने वाले राकेश खत्री बन गए 'नेस्ट मैन।' इसे जानने के लिए हमने राकेश खत्री से की खास बातचीत।
कैसे बने 'नेस्ट मैन' : राकेश बताते हैं कि वो बचपन में दिल्ली के चांदनी चौक में रहा करते थे। पुराने जमाने की तर्ज पर बने हमारे घर की छत पर टीन की शेड लगी होती थी। जिनमें कई चिडिय़ों के घोंसले हुआ करते थे। दीवारों से कुछ ईटें निकली होती थीं। उस खाली जगह पर भी चिडिय़ा घोंसला बनाया करती थी। हम स्कूल से आकर छत पर चिडिय़ों को पकड़कर उन्हें रंग लगाकर उड़ा दिया करते थे। उस दौर में लगभग सभी बच्चे इस तरह का खेल खेला करते थे। कुछ समय बाद वहां से मकान बदला और वो मयूर विहार दिल्ली में रहने लगे। तब तक वो कॉलेज में आ गए थे। वो कहते हैं कि 1978-79 के दौर में दिल्ली में कंस्ट्रक्शन काफी तेजी से हो रहा था। पेड़-पौधे कट रहे थे। पक्षियों के रैन-बसेरे मिट रहे थे। जो उन्हें काफी बैचेन कर रहा था। इन हालातों को देखते हुए उन्होंने हरे नारियल के खाली पड़े खोल और कुछ गत्ते के साथ अखबारों से 40 घोंसले बनाकर लगा दिए। वो कहते हैं कि अखबार में फोटोग्राफी की नौकरी करते थे। उस दौरान भी चिडिय़ों के लिए घोंसले बनाया करते थे। कुछ में चिडिय़ा आती थीं कुछ में नहीं आती थीं। वो एक बाग में घोंसले लगाने जाया करते थे। जहां एक दिन एक माली ने उन्हें रोककर कहा कि ये क्या करते हो तुम? उन्होंने जवाब दिया मैं चिडिय़ों के लिए घोंसले लगाता हूं। उन्होंने राकेश के काम की सराहना की और उन्हें कुछ देकर कहा कि तुम बहुत अच्छा काम कर रहे हो ये काम करते रहो। ये वाकया 2008 का है। उसके बाद वो कहते हैं कि हमने 20 घोंसले बनाए जिनमें से 19 घोंसले पास ही की अनाज मंडी में लगा दिए। वो सुबह से शाम तक कैमरा लेकर चिडिय़ों के आने का इंतजार करते थे। लोग मजाक उड़ाते थे। कहते थे कि चिडिय़ा अपने घोंसले में जाएगी आपके बनाए घोंसले में क्यों आएगी।