टावर ब्रिज जो लंदन ब्रिज की तुलना में अपेक्षाकृत नया है, लेकिन वास्तुशिल्प, सुंदरता और उपयोगिता के हिसाब से महत्वपूर्ण है। कई बार तो लोग टावर ब्रिज को ही लंदन ब्रिज समझ लेते हैं। इस ब्रिज के दोनों सिरों पर नदी के तल से 42 मीटर ऊंची टावर हैं जहां से लोहे के मोटे-मोटे रस्सों से ब्रिज को बांधा गया है। इन टावर पर पहुंचने के लिए लिफ्ट हैं और दोनों टावर के सिरों को जोड़ कर सैलानियों के लिए एक वाक वे बनाया है जिसके फर्श कांच के हैं जिससे नीचे से ट्रैफिक और नदी में होने वाली गतिविधियों को देखा जा सकता है। वैसे भी इस वाक वे से लंदन शहर का नयनाभिराम नजारा दिखता है इसलिए यह फोटोग्राफी के शौक़ीन लोगों के लिए यह बेहतरीन स्पॉट है।हुआ यूं कि लंदन शहर में ट्रैफिक बढ़ने के कारण एक नए ब्रिज की आवश्यकता अरसे से महसूस की जा रही थी, अठ्ठाहरवीं शताब्दी के मध्य तक लंदन दुनिया का सबसे बड़ा व्यापार केंद्र बन गया था, यह सारा का सारा व्यापार जल मार्ग से ही होता था इसी कारण मालवाहक जहाजों का आकार और ऊंचाई दोनों ही बढ़ गई थी और इतने बड़े जहाजों को लंदन के अपर पुल यानी माल उतारने के पुराने ठिकानों तक पहुंचाना चुनौती बनता जा रहा था, केवल छोटे छोटे जहाज लंदन ब्रिज के नीचे से गुजर के बर्मोंडसीस्थित चेरी गार्डन पियर ही पहुंच पाते थे।

इस समस्या का हल निकालने की जिम्मेवारी वास्तुविद सर होरेस जोन्स को दी गई। सन् 1886 में इसका निर्माण शुरू हुआ और 1894 में यातायात के लिए खोल दिया गया। इसकी विशेषता यह है कि ब्रिज के बीच की सड़क दो भागों में बांट कर ऊपर की तरफ उठने लगते है। इसके बाद नीचे से गुजारने वाले पोतों को संकेत किया जाता है और वे बड़े आराम से निकल जाता है। क्रॉस करने वाले पोत के लिए अनिवार्य है कि वह अपने टॉप पर फ्लैग लगाए। पोत गुजरने के बाद ब्रिज के बीच के भाग की सड़क धीरे-धीरे वापस यथास्थिति में आ जाती है। यह ब्रिज किस समय सड़क यातायात के लिए बंद रहेगा इसका शेड्यूल काफी पहले से यातायात संचालन विभाग की वेबसाइट पर रहता है ताकि उस समय आवश्यक कार्य से जाने वाले वैकल्पिक मार्ग को चुन सकें।