वर्ष 2023 सुप्रीम कोर्ट के लिए काफी महत्वपूर्ण रहा। इस साल कोर्ट ने कुछ ऐतिहासिक फैसले सुनाए,जो देश की अगली रेखा को खींचने में सहायक साबित होंगी। चुनावी वर्ष 2024 से पूर्व सुनाए गए फैसलों का असर चुनावों पर भी पड़ सकता है और इनसे भविष्य की रूप- रेखा भी तय होगी, इसमें कोई संदेह नहीं है। वैसे भी किसी भी देश की अदालत वहां की न्याय व्यवस्था के लिए बहुत अहम मानी जाती है। सुप्रीम कोर्ट भारत का सर्वोच्च न्यायालय है और इसका मुख्य कार्य कानून का पालन सुनिश्चित करना है। वैसे तो पूरे साल सुप्रीम कोर्ट में कई मुद्दे पहुंचे और कई मुद्दों पर अहम फैसले भी आए। कोर्ट ने तेजी के साथ फैसले कर इस बार रिकार्ड दर्ज किए। सुप्रीम कोर्ट ने इस साल 52,191 मामलों का निपटारा कर इतिहास रच दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कुछ ऐसे फैसले सुनाए, जिनसे न्याय व्यवस्था पर लोगों का विश्वास बढ़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में बताया कि आपसी सहमति से तलाक के लिए 6 महीने का वेटिंग पीरियड जरूरी नहीं होगा। न्यायालय ने कहा कि ऐसे मामलों में जहां पति पत्नी के साथ रह पाने की कोई संभावना न बची हो, वहां वो आर्टिकल 142 के तहत मिली विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए अपनी ओर से भी तलाक दे सकता है। दूसरी ओर जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाने के केंद्र सरकार के निर्णय को वैध करार देना,सुप्रीम कोर्ट के 2023 के अहम फैसलों में से एक फैसला है।
सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने अपने वर्डिक्ट में कहा कि जम्मू कश्मीर के पास भारत में विलय के बाद आंतरिक संप्रभुता का अधिकार नहीं है। अनुच्छेद 370 एक अस्थायी प्रावधान था। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर राज्य का दर्जा बहाल करने और 30 सितंबर 2024 तक चुनाव कराने के लिए कहा है। उधर 17 अक्तूबर को कोर्ट ने समलैंगिक जोड़ों की शादी को लेकर बड़ा फैसला सुनाया। कोर्ट ने ऐसे जोड़ों को कानूनी वैधता देने से इनकार कर दिया। ये फैसला मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच जजों की बेंच ने दिया। पीठ ने 3-2 के बहुमत से फैसला सुनाया। सर्वोच्च न्यायालय ने इस दौरान साफ कहा कि समलैंगिक शादी पर कानून बनाने का हक केवल संसद का है। चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने इस फैसले को पढ़ा था। अडानी-हिंडनबर्ग मामले ने पूरे देश में सुर्खियां बंटोरीं। सुप्रीम कोर्ट ने 2 मार्च को अडानी समूह की कंपनियों पर हिंडनबर्ग रिसर्च रिपोर्ट से उठे सवाल पर एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया था। समिति में शीर्ष अदालत के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति एएम सप्रे की अध्यक्षता में 6 सदस्य शामिल थे। शीर्ष अदालत ने तब सेबी से 2 महीने के भीतर स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने को कहा था।
सुप्रीम कोर्ट उस समय हिंडनबर्ग रिपोर्ट से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें निवेशकों के हितों की रक्षा के लिए नियामक तंत्र से संबंधित एक समिति का गठन भी शामिल था। इससे अलग हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने जो सूची जारी की है, वे काफी आशावादी है। अदालत ने 2022 में सिर्फ 39,800 मामलों का निपटारा किया था, जबकि इस साल 52,191 मामलों को निपटाया गया, इनमें 6,549 नियमित मामले थे और 45,642 लंबित मामले थे। इस आंकड़े को इस साल अदालत में दर्ज होने वाले मामलों की कुल संख्या के साथ देखने पर मामलों के निस्तारण की दर भी अदालत के लिए राहत की बात है। इस साल दर्ज होने वाले मामलों की कुल संख्या 49,191 थी। इस प्रणाली को 2017 में शुरू किया गया था, जिसके बाद 2018 में 37,470 और 2019 में 41,100 मामलों को निपटाया गया। सुप्रीम कोर्ट समेत देश की सभी अदालतों में लंबित मामलों की सूची लंबे समय से भारत की न्याय व्यवस्था के लिए चिंता का विषय रही है। कोविड-19 महामारी के दौरान मामलों के निपटारे की गति विशेष रूप से नीचे गिर गई थी। 2020 में सिर्फ 20,670 और 2021 में सिर्फ 24,586 मामलों का निपटारा हुआ था। 2022 में इस मामले में थोड़ी प्रगति दिखाई दी थी और अब जा कर 2023 में संख्या में काफी बड़ा उछाल दर्ज किया गया है। जानकारों का मानना है कि अदालत की प्रणाली से कोविड का असर खत्म करने की कोशिशें 2022 में शुरू की गई थीं। इन कोशिशों को एक एक कर तीन मुख्य न्यायाधीशों के कार्यकाल में आगे बढ़ाया गया। न्यायमूर्ति एनवी रमना, यूयू ललित और सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने इस कार्य में महती भूमिका निभाई।