संसद की सुरक्षा में चूक एक गंभीर मामला है, जिसे साधारण घटना नहीं बताया जा सकता है। इसके पीछे अंतर्राष्ट्रीय साजिश हो सकती है जिसका पर्दाफाश करना आवश्यक है। 13 दिसंबर की इस घटना ने वर्ष 2001 की याद दिला दी है। मालूम हो कि 13 दिसंबर 2001 को आतंकियों ने संसद भवन पर हमला किया था, जिसमें दिल्ली पुलिस के छह जवान तथा संसद की सुरक्षा में तैनात दो सुरक्षाकर्मी भी शहीद हो गए थे। तमाम सुरक्षा-व्यवस्था के बावजूद दो युवक लोकसभा की दर्शक दीर्घा से अचानक सांसदों के वेल में कूद कर अराजकता फैलाने की कोशिश करने लगे। एक युवक ने अपने साथ जूते के भीतर लेकर गए केन से पीले रंग का धुआं निकाला जिससे पूरा माहौल धुआं धुआं हो गया। इसी बीच दो सांसदों ने दोनों युवकों को घेर लिया तथा उसको पकडऩे में सुरक्षाकर्मियों की मदद की। उस वक्त पीठासीन अधिकारी राजेन्द्र अग्रवाल सदन की अध्यक्षता कर रहे थे। संसद के बाहर दो व्यक्ति जिसमें एक महिला भी शामिल थी कलर गैस के केन के साथ प्रदर्शन कर रहे थे। इस घटना की साजिश गुरुग्राम सेक्टर-7 में रची गई थी। कुल मिलाकर छह लोग इस साजिश में शामिल थे जिनमें से पांच लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है।

मैसूर से भाजपा के सांसद प्रताप सिम्हा ने सागर शर्मा एवं मनोरंजन को दर्शक दीर्घा का पास दिया था। इस घटना को लेकर 14 दिसंबर को संसद के दोनों सदनों में काफी हंगामा हुआ। अभी तक लोकसभा के 14 तथा राज्यसभा के एक सांसद को संसद के शीतकालीन सत्र से निलंबित कर दिया गया है। राज्यसभा में तृणमूल कांग्रेस के सांसद डेरेक ओ ब्रायन तथा लोकसभा से कई विपक्षी दल के सांसदों के खिलाफ हंगामा करने के आरोप में कार्रवाई की गई है। कई विपक्षी सांसदों ने संसद की सुरक्षा में चूक के लिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के इस्तीफे तथा प्रधानमंत्री से बयान देने की मांग की है। इस घटना की उच्च स्तरीय जांच का आदेश भी दिया जा चुका है। जांच के बाद यह पता चलेगा कि इस साजिश के पीछे किन-किन शक्तियों का हाथ है। प्रश्न यह उठता है कि तमाम सुरक्षा-व्यवस्था के बीच ये लोग केन लेकर कैसे संसद के भीतर घुस गए? इस घटना के बाद संसद की सुरक्षा-व्यवस्था और कड़ी कर दी गई है तथा आधुनिक उपकरणों को लगाया गया है। आठ सुरक्षा कॢमयों को भी निलंबित कर दिया गया है।

केवल सुरक्षा कर्मियों के निलंबन से काम नहीं चलेगा, बल्कि इस साजिश के तह तक पहुंचना होगा ताकि भविष्य में इस तरह की घटना न हो। खासकर संसद भवन पर हमले की 22वीं वर्षगांठ पर सुरक्षा-व्यवस्था में ढील स्वीकार नहीं किया जा सकता। सिख फॉर जस्टिस के प्रमुख गुरपतवंत सिंह पन्नू की धमकी के बाद सुरक्षा एजेेंसियों को चौकस हो जाना चाहिए था। पन्नू ने अंजाम भुगतने की धमकी दी थी। पन्नू ने भारत में सिखों से जनमत संग्रह शुरू कराने तथा बाहर के सिखों से समर्थन देने की अपील की है। जनमत संग्रह के लिए 26 एवं 28 जनवरी का समय दिया गया है। पन्नू ने 1984 के सिख दंगे का उदाहरण देकर सिखों से अपने हित के लिए हथियार उठाने के लिए कहकर सिखों को भड़काने का प्रयास किया है। कनाडा खालिस्तानियों का गढ़ बन गया है, जहां भारत विरोधी गतिविधियां चलाई जा रही हैं। आश्चर्य की बात यह है कि कनाडा की सरकार इन खालिस्तानियों को संरक्षण एवं समर्थन दे रही है।

इस मुद्दे पर भारत और कनाडा की सरकारें आमने-सामने आ गई है। अब पन्नू को लेकर भारत और अमरीका के बीच नई बहस शुरू हो गई है। अमरीका जहां पन्नू को अपना नागरिक बताकर सुरक्षा देने में लगा है वहीं भारत पन्नू को आतंकवादी मानता है जो भारत को तोडऩे में लगा है। इस मामले को लेकर अमरीकी खुफिया एजेंसी एफबीआई के चीफ क्रिस्टोफर रे के साथ भारतीय एजेंसियों की बातचीत हो रही है। क्रिस्टोफर फिलहाल भारत के दौरे पर हैं। अमरीका जैसा देश आतंकवाद के मुद्दे पर डबल गेम खेल रहा है जो खतरनाक है। अमरीका को इस मामले में दोहरी भूमिका नहीं अपनानी नहीं चाहिए। भारत शुरू से ही आतंकवाद के खिलाफ एक जैसी नीति अपनाने पर जोर दे रहा है। संसद की सुरक्षा-व्यवस्था में चूक से सबक लेकर भारत को अपनी सुरक्षा-व्यवस्था को और चाक-चौबंद करनी चाहिए।