डिजिटल डेस्क : केंद्र ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि देश भर में अवैध प्रवासियों के बारे में पता लगाना, हिरासत में लेना एक "जटिल" प्रक्रिया है। जनवरी 1966 से 25 मार्च 1971 के बीच भारत में प्रवेश करने वाले और असम में बस जाने वाले 17,000 से अधिक बांग्लादेशी प्रवासियों को नागरिकता प्रदान की गई थी। 

नागरिकता अधिनियम की धारा 6A की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सात दिसंबर को प्रधान न्यायाधीश धनंजय वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता में पांच न्यायाधीशों की संविधान बेंच द्वारा सवालों के जवाब में एफिडेविट पेश की गई है। संविधान बेंच के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति सूर्य कांत, न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश, न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा शामिल हैं। 

यह प्रावधान दिसंबर 1985 में असम समझौते के हिस्से के रूप में पेश किया गया था - बांग्लादेश के उन लोगों को नागरिकता लाभ प्रदान करने के लिए जो जनवरी  1966 और 25 मार्च, 1971 के बीच भारत में प्रवेश करते थे, और आमतौर पर असम में रहते थे ।

बेंच ने मामले की सुनवाई 12 दिसंबर के लिए स्थगित करते हुए केंद्र को निर्देश दिया था कि वह इस अवधि के दौरान पकड़े गए विदेशियों की संख्या और इस प्रावधान के तहत वास्तव में लाभान्वित हुए लोगों की संख्या का विवरण प्रदान करे। 

केंद्रीय गृह सचिव अजय कुमार भल्ला ने सोमवार को जवाब के तौर पर अदालत को सूचित किया कि संबंधित अवधि (जनवरी 1966 से 25 मार्च 1971) के दौरान विदेशी न्यायाधिकरणों द्वारा कुल 32,381 लोगों का विदेशी के रूप में पता लगाया गया हैं और इस साल 31 अक्टूबर तक एफआरआरओ के साथ पंजीकृत होने के बाद 17,861 लोगों को नागरिकता मिली।

एफिडेविट मैं कहा गया है की, क्योंकि ऐसे विदेशी नागरिकों का देश में प्रवेश अनजान होता है, इसलिए देश के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले ऐसे अवैध प्रवासियों का सथिक डेटा एकत्र करना संभव नहीं है ।