भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने वर्ष 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर दलित, अनुसूचित जनजाति एवं पिछड़े वर्ग को साधने की तैयारी शुरू कर दी है। मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्रियों के चुनाव के दौरान यह बात बिल्कुल स्पष्ट हो गई है। विपक्षी दलों द्वारा जातिगत जनगणना करने की मांग को देखते हुए भाजपा ने भी जातिगत समीकरण पर ध्यान केंद्रित करना शुरू कर दिया है। मध्यप्रदेश में भाजपा ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पृष्ठभूमि वाले नेता मोहन यादव को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बनाकर पूरे देश में पिछड़े वर्ग के बीच एक सकारात्मक संदेश देने का भरसक प्रयास किया है। 230 सदस्यीय मध्यप्रदेश विधानसभा में भाजपा ने 163 सीटें जीतकर अपनी पकड़ का एहसास करवाया है। मोहन यादव ने अपनी राजनीतिक यात्रा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से शुरू की है। साथ में पार्टी क्रमश: जगदीश देवड़ा एवं राजेन्द्र शुक्ला को उपमुख्यमंत्री बनाएगा। राजेन्द्र शुक्ला के माध्यम से पार्टी ब्राह्मण मतदाताओं पर डोरे डालेगी। पूर्व केंद्रीय मंत्री नरेन्द्र ङ्क्षसह तोमर को विधानसभा अध्यक्ष बनाया जाएगा।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के इस फैसले से पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज ङ्क्षसह चौहान एवं भाजपा के वरिष्ठ नेता कैलाश विजयवर्गीय को निश्चित रूप से धक्का लगा है। इसी तरह छत्तीसगढ़ में विष्णुदेव साय को मुख्यमंत्री के लिए चयन कर भाजपा ने देश के आदिवासी वोटरों को संदेश देने का प्रयास किया है कि पार्टी उसकी हितैषी है। अरुण साव और विजय शर्मा को उपमुख्यमंत्री बनाने का निर्णय लेकर भाजपा ने ओबीसी एवं ब्राह्मण मतदाताओं को भी अपने पाले में करने का प्रयास किया है। विष्णुदेव साय की छवि साफ-सुथरी है तथा वे पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह के करीबी माने जाते हैं। साय दो बार प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं तथा वे मोदी के प्रथम कार्यकाल में केंद्रीय राज्यमंत्री के रूप में भी काम कर चुके हैं। नेता चुनने के तुरंत बाद साय ने मोदी की गारंटी को पूरा करने का संकल्प लिया है। लगभग एक सप्ताह से मध्यप्रदेश, राजस्थान एवं छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री के चयन को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई थी। मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री पद के ऐलान के साथ तस्वीर बिल्कुल साफ हो चुकी है।

लेकिन राजस्थान में अभी भी खींचतान की स्थिति बनी हुई है। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे हथियार डालने को तैयार नहीं हैं, जबकि मोदी और शाह हर हालत में वसुंधरा को मुख्यमंत्री के रूप में नहीं देखना चाहते हैं। भाजपा की कद्दावर नेता वसुंधरा ने शक्ति प्रदर्शन कर यह दिखाने का भरसक प्रयास किया है कि वे मुख्यमंत्री के रेस में बनी हुई है। अपने समर्थक विधायकों के साथ लगातार बैठक कर अगली रणनीति बनाने में व्यस्त हैं। पार्टी के पर्यवेक्षकों को सर्वसम्मति से नेता चुनने के मामले में एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ रहा है। यही कारण है कि विधायक दल की बैठक को लगातार टाला जा रहा है। भाजपा ने राजस्थान की विकट स्थिति को देखते हुए राजनाथ सिंह जैसे सुलझे हुए नेता को मुख्यमंत्री चुनने की जिम्मेवारी सौंपी है। भाजपा का मानना है कि तीनों राज्यों का चुनाव पार्टी ने मोदी के चेहरे पर जीता है। अत: मुख्यमंत्री के चयन का निर्णय मोदी के मनमुताबिक होना चाहिए।