एमपी, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भाजपा की शानदार जीत के बाद कहा जा रहा कि फिलहाल देश प्रगति के पथ पर अग्रसर है। देश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में उन्नति कर रहा है, इसलिए मतदाता उन्हें झोला भरकर वोट दे रहे हैं। साथ ही यह भी कहा जा रहा कि वर्तमान सरकार से महिला, पुरुष, युवक-युवती और छात्र-छात्राएं सब खुश हैं तभी तो भाजपा के प्रति जनसमर्थन दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। दावा यह भी है कि वर्तमान सरकार में शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भारी परिवर्तन हुआ है। लोगों को सहज शिक्षा और सहज स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हो रही हैं। सरकारी योजनाएं समाज के अंतिम व्यक्ति तक को ध्यान में रखकर बनाई जा रही हैं और उसे फलीभूत की जा रही हैं, परिणामत: वर्तमान सरकार से आम आवाम खुश है, परंतु राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े बताते हैं कि महिला सुरक्षा के मोर्चे पर हालात बेहद खराब हैं। एनसीआरबी के रिकॉर्ड के मुताबिक 2021 की तुलना में 2022 में महिलाओं पर अपराध में चार फीसदी का इजाफा हुआ है। यह बढ़ोतरी मामूली लग सकती है लेकिन इसी अवधि में संज्ञेय अपराधों में आई 4.5 फीसदी की कमी के कारण अच्छी-खासी वृद्धि हुई है। वर्ष 2022 में कुल 4,45,256 मामले दर्ज किए गए, यानी हर घंटे 51 प्राथमिकी दर्ज की गईं। इसके बावजूद यह चौंकाने वाला आंकड़ा शायद काफी हद तक सीमित तस्वीर पेश करता है और केवल उन्हीं अपराधों के बारे में बताता है जिन्हें दर्ज किया गया।
यह बात हम सभी जानते हैं कि महिलाएं अपने खिलाफ होने वाले अपराधों की जानकारी देने के लिए सामने नहीं आतीं। इसकी कई वजह हैं जिनमें सामाजिक शोषण से लेकर व्यक्तिगत खतरा, हठधर्मिता और पुलिस तथा न्यायपालिका की उदासीनता तक शामिल हैं। ऐसे में कहा जा सकता है कि संकट कहीं अधिक गंभीर है। महिलाओं के लिए असुरक्षित माहौल ही उन्हें श्रम शक्ति में शामिल होने से रोकता है। यह बात भी देश की कमजोर श्रम शक्ति भागीदारी दर के लिए जिम्मेदार है। एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि समस्या की शुरुआत भारतीय परिवारों में ही होती है जहां पति या रिश्तेदारों की 31.4 फीसदी मामलों की प्राथमिक वजह है। हालांकि यह विशिष्ट अपराध के मामले में दहेज विरोधी कानूनों को सख्त बनाने की तत्काल आवश्यकता है, लेकिन इसके साथ ही यह महिलाओं को वस्तु समझने के सामाजिक रूढ़िवादी दृष्टिकोण को भी दर्शाता है। इसका निष्कर्ष यह है कि ऐसे रवैए में पुरुष नौकरी या कैरियर के मामले में परिवार की महिलाओं की वित्तीय या सामाजिक स्वतंत्रता को प्रोत्साहित करने की प्रवृत्ति नहीं रखते। यह पुरुषवादी मानसिकता कई स्तरों पर प्रभाव उत्पन्न कर सकती है। यह स्वत: ही कार्यस्थल तक पहुंच जाता है और महिला कर्मचारियों के कैरियर को प्रभावित करता है। इसके साथ ही महिलाओं को घर तक सीमित रखना भी सार्वजनिक माहौल को बहुत हद तक असुरक्षित रखने वाला है।
महिलाओं पर अपराधों में 26 फीसदी बलात्कार और हमलों के हैं। इसके अलावा कन्याओं के खिलाफ मध्ययुगीन सामाजिक प्राथमिकताओं के चलते देश के कई हिस्सों में महिला-पुरुष अनुपात बहुत बुरी तरह बिगड़ गया है। यही कारण है कि अपहरण करके महिलाओं को लाया जाता है ताकि उन्हें पत्नी बनाया जा सके और बच्चे पैदा किए जा सकें। इस श्रेणी का अपहरण महिलाओं के खिलाफ अपराध में तीसरे क्रम पर है। एक अन्य अहम बिंदु यह है कि महिलाओं पर सबसे अधिक अपराध अपेक्षाकृत औद्योगिक राज्यों मसलन महाराष्ट्र और राजस्थान में हो रहे हैं या ऐसे राज्यों में जिन्हें खुद को आर्थिक शक्ति के रूप में बदलने की आवश्यकता है, मसलन पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश। इनको छोड़कर अन्य राज्यों में महिलाओं पर अपराध के 65,000 मामले पंजीकृत हैं। दुख है कि राष्ट्रीय राजधानी में महिलाओं पर अपराध की दर राष्ट्रीय औसत से अधिक है। केंद्र सरकार को इस बात पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि वहां का पुलिस बल सीधे केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन आता है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि सिर्फ आर्थिक उन्नति को ही विकास का पैमाना नहीं माना जाता है। आर्थिक उन्नति के साथ-साथ सामाजिक उन्नति भी अति आवश्यक है, इसलिए सरकार को इस पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।