नि:संदेह सिलक्यारा सुरंग में फंसे मजदूरों को बाहर निकालना सराहनीय कार्य है। इस सफलता की जितनी भी तारीफ की जाए, वह कम है। इस कार्य के लिए सरकार के साथ-साथ रैट होल खनन मजदूर भी बधाई के पात्र हैं, जिन्होंने अपने कार्यों से 41 लोगों की जान बचा ली और संबंधित लोगों के परिजनों के चेहरों पर खुशी लाने में सहायक बने। सरकार ने मजदूरों को बाहर निकालने के लिए कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि सभी ने ईमानदारी के साथ काम किया और नतीजा सफल रहा। भारत की इस सफलता की वैश्विक मीडिया ने भी सरहना की। साथ ही सुर्खियां लगाई कि मशीन पर रैट माइनिंग श्रमिकों की मेहनत काम आई, जो आज भी मानव श्रम की महत्ता को दर्शता है। इस कार्य को सफल बनाने में नौ सरकारी एजेंसियां दिन-रात मेहनत कर रही थीं ताकि किसी भी तरह मजदूर सुरंग से बाहर आ जाएं। पीएमओ सीधे इस बचाव कार्य पर नजर रख रहा था। प्रधानमंत्री कार्यालय ने स्वास्थ्य, सड़क, परिवहन एवं राजमार्ग और दूरसंचार मंत्रालयों को सभी उपलब्ध संसाधनों के साथ पूरी ताकत झोंक देने का निर्देश दे रखा था। सुरंग तकनीक एवं बचाव कार्य में विशेषज्ञता रखने वाली विदेशी एजेंसियों की भी मदद ली गई।
सभी एजेंसियों ने अपनी तरफ से पूरा योगदान दिया और कठिन चुनौतियों के बीच 70 से 90 मीटर मलबे के नीचे कामगारों तक भोजन एवं आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति की गई। यहां याद दिलाना जरूरी है कि एक बार पश्चिम बंगाल के रानीगंज के पास स्थित महावीर कोयला खदान में कार्य करते समय खदान में भारी संख्या में मजदूर फंस गए थे, क्योंकि खदान से बाहर निकलने वाले रास्ते पर पानी भर गया था, इसके बाद वे सभी मजदूर खदान में पांच-छह किलोमीटर दूर सुरक्षित स्थान पर जाकर अपनी जान बचाई थी और उन्हें संबंधित इलाके में खनन करके बाहर निकाला गया, यह कार्य पूरी दुनिया में एक महत्वपूर्ण था, जिस पर हाल ही में मिशन रानीगंज के नाम से एक फिल्म भी आई है। दूसरी ओर थाईलैंड में भी 2018 में एक बार ऐसी ही घटना हुई थी। वहां एक फुटबॉल टीम के 12 किशोर लड़के एवं उनके प्रशिक्षक एक बाढ़ग्रस्त गुफा में फंस गए थे। उन्हें बाहर निकालने के लिए अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों की एक टीम तैयार की गई और कड़ी मेहनत के बाद 18 दिन बाद उन्हें बाहर निकाला जा सका। सिलक्यारा घटना इस मायने में अलग है कि इसमें ज्यादातर स्थानीय एजेंसियों ने मोर्चा संभाल रखा था। सिलक्यारा में बचाव कार्य सफलतापूर्वक पूरा होने के बाद इसे भारत की जुगाड़ तकनीक की एक अद्भभुत मिसाल के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। भारत में अंतिम क्षणों में बचाव कार्य में अहम भूमिका भारतीय श्रम व्यवस्था में अत्यधिक पिछड़े एवं प्राय: उपेक्षित श्रमिकों ने निभाई।
जब अत्याधुनिक मशीन उपकरण कुछ विशेष नहीं कर पाए तब रैट-होल कोयला खनिकों ने बहुत ही कम जगह में गैस कटर, कुदाल और खाली हाथों से मलबे की अंतिम परत हटाई। इन खनिकों की यह अनूठी एवं पुरानी विशेषज्ञता नौ वर्ष पूर्व प्रतिबंधित होने के बाद अब भी मौजूद है। राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण और उच्चतम न्यायालय ने इस विधि पर प्रतिबंध लगा दिया था। रैट-होल माइनिंग पूर्वी एवं पूर्वोत्तर भारत में रोजगार की कमी के बारे में काफी कुछ कह जाती है। इन क्षेत्रों में रैट-होल माइनिंग विधि का इस्तेमाल होता है और सरकारी विभागों एवं उद्योगों की सांठगांठ से यह विधि अब भी अस्तित्व में बनी हुई है। रैट-होल खनिकों की ओर से दिखाई गई क्षमता को देखते हुए राज्य आपदा प्रबंधन में एक विकल्प के रूप में इस विधि का इस्तेमाल किया जा सकता है। इन क्षेत्रों में बड़े स्तर पर निर्माण कार्यों को देखते हुए यह तरीका भी एक विकल्प के रूप में आजमाया जा सकता है। सिलक्यारा आपदा हमारा ध्यान इस तरफ खींचती है कि केंद्र एवं राज्य सरकारें अत्यधिक संवेदनशील हिमालय क्षेत्र में किस तरह अंधाधुंध बड़े एवं अनावश्यक आधारभूत ढांचे- सड़क, सुरंग, रेलवे, बांध आदि- तैयार कर पर्यावरण से जुड़े जोखिम मोल ले रही हैं। इन परियोजनाओं की ढांचा भी पुख्ता नहीं होता है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि रैट होल श्रमिकों ने सराहनीय कार्य किया है, इसलिए एक बार उनके भविष्य पर भी विचार करने की जरूरत है।