पिछले कुछ महीनों से म्यामां में सरकार तथा लोकतंत्र समर्थक विद्रोही गुटों के बीच चल रहा संघर्ष तेज हो गया है। सैन्य प्रशासक जुंटा के नेतृत्व में वर्ष 2021 में सशस्त्र तख्तापलट की घटना हुई थी। सैन्य प्रशासन ने लोकतांत्रिक सरकार पर कब्जा कर लिया था। इसके खिलाफ म्यामां के तीन संगठनों चिन नेशनल आर्मी, अर्कन आर्मी तथा पीपुल्स डिफेंस फोर्स आदि ने मिलकर जुंटा सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए संघर्ष शुरू किया है। पिछले अक्तूबर महीने में विद्रोही गुटों ने कई सैन्य चौकियों पर कब्जा करना भी शुरू कर दिया है। म्यामां की सेना ने भारत की सीमा से सटे अपने क्षेत्रों में विद्रोही गुटों के ठिकाने पर भारी बमबारी की है जिससे हजारों की संख्या में शरणार्थी भागकर मिजोरम की सीमा चले आए। ऐसी खबर है कि लगभग 5 हजार शरणार्थी मिजोरम की सीमा में शरण ले चुके हैं। भारत सरकार ने अभी तक इस मामले में अपनी चुप्पी नहीं तोड़ी है ङ्क्षकतु सुरक्षा बल स्थिति पर पैनी नजर रखे हुए हैं। भारत से म्यामां की 1600 किमी की सीमा लगती है जिसमें कुछ ऐसा क्षेत्र है जहां से आसानी से घुसपैठ किया जा सकता है।

भौगोलिक स्थिति के कारण कुछ क्षेत्रों में सुरक्षा बलों की चौकियां सीमा से काफी अंदर स्थापित की गई है क्योंकि पहाड़ एंवं जंगल होने के कारण उन क्षेत्रों में ढांचागत सुविधा का अभाव है।  अगर भारत-म्यामां की सीमा पर लंबे समय तक इस तरह की घटना चलती रही तो इसका प्रभाव भारत पर निश्चित रूप से पड़ेगा। भारत दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के साथ पूर्वोत्तर को जोडऩे के लिए एक्ट ईस्ट पॉलिसी के तहत म्यामां के द्वारा थाईलैंड को भारत से जोड़ने के लिए सड़क परियोजना पर काम कर रहा है। अगर म्यामां में अशांति का दौर जारी रहा तो इस परियोजना के पूरा होने में विलंब हो सकता है। इसके अलावा पूर्वोत्तर क्षेत्र को नए समुद्री मार्ग से म्यामां को जोडऩे के लिए कलादान परियोजना पर काम चल रहा है। यह परियोजना पूरा होने की स्थिति में है। बांग्लादेश से होते हुए म्यामां को जोड़ने का काम चल रहा है। अशांति होने से इस परियोजना के काम पर असर पर सकता है। भारत के मणिपुर एवं मिजोरम की सीमा म्यामां से लगती है। जुंटा की सेना विद्रोही गुटों पर दबदबा बनाने के लिए पूर्वोत्तर में सक्रिय उग्रवादी संगठनों को भी हथियार एवं दूसरे की मदद मुहैया कराती है।

वहां की सेना इन आतंकियों की मदद से अपने यहां के लोकतंत्र समर्थक विद्रोही गुटों पर अंकुश लगाना चाहती है। लेकिन समस्या यह है कि म्यामां में स्थिति शांत होने के साथ ही पूर्वोत्तर के आतंकी गुट उस हथियार का इस्तेमाल भारत के खिलाफ करने से परहेज नहीं करेंगे। मणिपुर में पिछले कई महीनों से अशांति का दौर चल रहा है। कुकी एवं मैतेई समुदाय के बीच जनजातीय श्रेणी को लेकर चल रहा हिंसात्मक दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है। म्यामां में सक्रिय आतंकी संगठन मणिपुर की स्थिति का फायदा उठाते हुए अपना हित साधने के लिए हिंसात्मक गतिविधियों को बढ़ावा दे रहा है। आतंकी संगठनों द्वारा की गई हिंसात्मक कार्रवाई में अनेक नागरिक तथा सुरक्षा बल के जवान मारे गए हैं। ऐसी स्थिति में मिजोरम पर भी पैनी नजर रखने की जरूरत है। अगर म्यामां की विस्फोटक स्थिति का प्रभाव मिजोरम पर पड़ता है तो देश के लिए काफी चिंता का विषय होगा। मिजोरम पहले से ही मिजो नेशनल फ्रंट के बैनर तले अशांत रहा है। सरकार को यह सुनिनिश्चत करना चाहिए कि फिर से मिजोरम में आंतकी संगठन अपना पैर नहीं जमा सके। म्यामां की राजनीति स्थिति भारत के लिए चिंता का विषय है। भारत हमेशा से लोकतंत्र का समर्थक रहा है, लेकिन वहां की सैनिक प्रशासन ने जबर्दस्ती सत्ता पर कब्जा किया हुआ है। पड़ोसी देश चीन वहां के सैनिक सरकार की पूरी मदद करता है। चीन म्यामां में अपनी पैठ मजबूत बनाकर भारत विरोधी गतिविधियों को बढ़ावा देना चाहता है। ऐसी स्थिति में भारत चाहकर भी सैनिक सरकार का पूरजोर विरोध नहीं कर सकता। इसके पीछे भारत के हित भी छिपे हुए हैं। यही कारण है कि भारत म्यामां के मामले में नपातुला कदम उठाता है।