पूर्वांचल प्रही स्टाफ रिपोर्टर गुवाहाटी : कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष सप्तमी तिथि पर उदीयमान भगवान भास्कर को अर्घ्य देने के साथ ही लोक आस्था का चार दिवसीय छठ महापर्व  समाप्त हो गया। इसके बाद रविवार से आज सुबह तक छठ मैया के गीतों ,भजनों तथा बैंडबाजे की धून से गूंजने वाले तथा हलचल रहे छठ घाटों पर अब सन्नाटा विराजमान हो चुका है।  वर्षों पहले बिहार राज्य से शुरू यह सनातनी परंपरा विश्व स्तर तक पहुंच गई है। जहां भी इस प्रांत के लोग गए, वही अपने परंपरागत संस्कार को अटूट श्रद्धा भक्ति के साथ पालन किया और यह सिलसिला लगातार चल रहा है, जिसके चलते एशिया महादेश के साथ ही अमरीका व अन्य देशों में भी हर साल पूरी तन्मयता के साथ इस महापर्व का आयोजन किया जाता है। आज एक बार फिर से सदिया से लेकर धुबड़ी तक के छठ घाटों व जलाशयों पर व्रतधारियो तथा श्रद्धालु भक्तो का हुजूम दिखा।

आज के समय में एक मात्र प्रत्यक्ष भगवान सूर्य की उपासना के पावन अवसर पर सभी घठ घाटों की छटा एक जैसी दिख रही थी। घाट पर उपस्थित सभी लोगों में सूर्योपासना के प्रति अटूट श्रद्धा भक्ति दिखाई। महाबाहु  ब्रह्मपुत्र के साथ ही अन्य नदियो तथा तलाबों के जल में पूरब की ओर  खड़े होकर हाथो में धूप व दीप लेकर  आदित नाथ के उगने का इंतजार करने लगे। सबसे अहम बात यह है कि पूर्वोत्तर के अरूणाचल प्रदेश से सूर्यदेव पूरे सज- धज कर गगन मांग में निकले। इसके साथ ही उग हे सूरज मल देव.....के गीत के जरिए उनके जल्द उगने के लिए गोहराने लगे, वही दिन के करीब 5.45 बजे पूरब से सूरज की लालिमा दिखाई देते ही व्रतधारियो नें घर में बने ठेकुवा, मिठाई, कोले ( केला) का घवद व अन्य फल, नारियल आदि के साथ ही दूध व गंगाजल से आदित्य देव को अर्ग्घ अर्पित किए। वही घाटों पर सुहागिन महिलाओं ने एक दूसरी महिलाओं को सिंदूर का टीका लगाकर तथा पुरूषों तथा युवाओ को तिलक लगाकर निरोग तथा सुख शांति व समृद्धि का आशाष दिया।

इसके साथ ही खरना के दिन से जारी 36 घंटो का निर्जला उपवास खत्म हो गया। कुछ व्रती घठ घाट पर तो अधिकाधिक अपने घर आकर  कच्चे दूध का शरबत पीकर तथा थोड़ा प्रसाद खाकर,गुड़,चाय ग्रहण कर पारण या परना किया। इसके साथ ही घाट से ही प्रसाद बांटने का सिलशिला शुरू हो गया, जो दिन भर चलता रहा।  भक्ति और आध्यात्म से परिपूर्ण इस महापर्व के मौके पर बाँस से बने सूप, टोकरी, मिट्टी के बर्तनों, गन्ने का रस, गुड़, चावल और गेहूं से निर्मित प्रसाद और सुमधुर लोकगीतों से युक्त होकर लोक-जीवन की भरपूर मिठास का प्रसार करता है। सूर्य की शक्तियों का मुख्य श्रोत उनकी पत्नी ऊषा और प्रत्यूषा हैं। छठ में सूर्य के साथ-साथ दोनों शक्तियों की संयुक्त आराधना होती है। प्रात:काल में सूर्य की पहली किरण (ऊषा)और सायंकाल में सूर्य की अंतिम किरण (प्रत्यूषा) को अघ्र्य देकर दोनों का नमन किया जाता है। भारत में सूर्योपासना ऋ गवेद काल से होती आ रही है। सूर्य और इसकी उपासना की चर्चा विष्णु पुराण, भगवत पुराण, ब्रह्मा वैवर्त पुराण आदि में विस्तार से की गयी है। 

पौराणिक काल में सूर्य को आरोग्य देवता भी माना जाने लगा था। सूर्य की किरणों में कई रोगों को नष्ट करने की क्षमता पायी गयी। भगवान कृष्ण के पौत्र शाम्ब को कुष्ठ रोग हो गया था। इस रोग से मुक्ति के लिए विशेष रूप से सूर्योपासना की गयी, जिसके लिए शाक्य द्वीप से ब्राह्मणों को बुलाया गया था। एक मान्यता के अनुसार लंका विजय के बाद रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की। सप्तमी को सूर्योदय के समय पुन: अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया था।  महाभारत काल में हुई थी। सबसे पहले सूर्यपुत्र कर्ण ने सूर्यदेव की पूजा शुरू की। कर्ण भगवान सूर्य के परम भक्तथे। वह प्रतिदिन घण्टों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्यदेव को अध्र्य देते थे। कुछ कथाओं में पांडवों की पत्नी द्रौपदी द्वारा भी सूर्य की पूजा करने का उल्लेख है। वे अपने परिजनों के उत्तम स्वास्थ्य की कामना और लम्बी उम्र के लिए नियमित सूर्य पूजा करती थीं।