इन दिनों छठ महापर्व की धूम है। पटना से दिल्ली तक और गुवाहाटी से पटना तक पहुंचने के लिए यात्री परेशानी में दिखे। छठ महापर्व को देखते हुए वे देश के किसी भी कोने से अपने गृह राज्य बिहार पहुंचने को बेताब दिखे, परंतु ट्रेन, बस और हवाई जहाज सबके सब उन्हें अपने गतंव्य तक पहुंचाने में अपर्याप्त रहे और उन्हें अपने गंतव्य तक पहुंचने में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। ये परेशानी और कठिनाई साबित करते हैं कि केंद्र सरकार हो या बिहार सरकार दोनों की प्राथमिकता में बिहार के प्रवासी मजदूर शामिल नहीं हैं, जो भारी कष्टों के बावजूद अपनी मिट्टी से जुड़ा रहना चाहते हैं। सरकार जब अपनी विकास नीतियां बनाती हैं तो वह इन मजदूरों को नजरअंदाज करती है और उनकी सुविधाओं को ध्यान में रखकर नीतियां नहीं बनातीं। उल्लेखनीय है कि बिहार से रोजी-रोटी कमाने बाहर गए लोगों का त्योहार के इस मौसम में घर लौटने का क्रम दशहरा व दिवाली से ही जारी है। चार दिवसीय छठ महापर्व के समीप आते-आते यह चरम पर पहुंच जाता है।
इस बार भी लाखों की संख्या में देश के कोने-कोने से लोग बिहार के विभिन्न जिलों में अपने-अपने घर लौट रहे हैं, लेकिन ट्रेन हो या बस या फिर विमान, मारामारी इतनी होती है कि उनके लिए घर पहुंच पाना जंग जीतने से कम नहीं होता। ऐसे कई वीडियो इंटरनेट पर वायरल हो रहे हैं। देशभर के भिन्न-भिन्न शहरों में स्टेशन व बस अड्डों पर भीड़ उमड़ रही है। ट्रेनों में जगह नहीं है, घुसने भर के लिए मारामारी हो रही है। छठ पूजा में घर आने के लिए सूरत में ताप्ती एक्सप्रेस पकडऩे के लिए उमड़ी भीड़ से अफरा-तफरी मच गई। कुछ लोग बेहोश हो गए, कुछ भीड़ में फंस गए जिनमें एक व्यक्ति की मौत हो गई। काठगोदाम जाने वाली काठगोदाम एक्सप्रेस की जनरल बोगी में इतनी भीड़ थी कि सारण जिले के एक व्यक्ति की जान चली गई। ट्रेन के अंदर की स्थिति भी भेडिय़ा धसान की तरह रहती है। एसी और जनरल बोगी का फर्क नहीं रह जाता है, जो भी ट्रेन गुजरात, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, असम या राजस्थान से बिहार पहुंचीं, वह खचाखच भरी हुईं दिखीं। ऐसा नहीं है कि सरकार की तरफ से भीड़ को देखते हुए रेलगाडिय़ों की व्यवस्था नहीं की गई। कई पूजा स्पेशल ट्रेन चलाए गए। पूर्व-मध्य रेलवे ने इस साल 82 स्पेशल ट्रेन चलाई।
पिछले वर्ष ऐसी 56 ट्रेन चलाई गई थीं। ये सभी 1400 फेरे लगाएंगी। रेगुलर डेढ़ लाख बर्थ के अतिरिक्त एक लाख 75 हजार बर्थ की व्यवस्था की गई है। कोविड के बाद दूसरी बार छठ मनाया जा रहा है, इसलिए भीड़ काफी है। हर साल रेलवे स्थिति से निपटने के लिए पुरजोर व्यवस्था करती है, लेकिन इतनी अधिक संख्या में लोग बिहार का रुख करते हैं कि सारी व्यवस्था तहस-नहस हो जाती है,चाहे मामला ट्रेन का हो या स्टेशन का और यह संख्या दिनों-दिन बढ़ती ही जा रही है। इससे इतर यात्रियों की दुर्दशा यह बताती है कि रेलवे की तमाम व्यवस्थाओं के बाद ट्रेनों में भीड़ बेकाबू है। स्पेशल ट्रेन के बारे में यात्री कहते हैं कि इन ट्रेनों का कोई माई-बाप नहीं होता है। एक यात्री की मानें तो स्पेशल ट्रेन को 14 तारीख की शाम साढ़े पांच बजे पटना पहुंचना था, लेकिन यह नौ घंटे 43 मिनट की देरी से पहुंची। कई तो 24-24 घंटे विलंब से चलीं। किसी में पानी नहीं होता, तो किसी का एसी काम नहीं कर रहा होता तो किसी बोगी में लाइट तक नहीं होती।
तभी तो बुधवार को पंजाब के सरहिंद से बिहार के सहरसा जाने वाली ट्रेन के 16 घंटे से ज्यादा लेट होने का मामला पीएमओ तक पहुंच गया और रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव को रेलवे बोर्ड के चार अधिकारियों को तलब करना पड़ गया। नई दिल्ली-दरभंगा क्लोन एक्सप्रेस में उत्तर प्रदेश के इटावा में स्लीपर बोगी में लगी आग और दिल्ली से सहरसा जा रही वैशाली एक्सप्रेस की स्लीपर कोच में लगी आग का कारण लोग रिजेक्टेड रैक का इस्तेमाल किया जाना बता रहे हैं। वैशाली एक्सप्रेस में 19 लोगों के झुलसने की सूचना है। हर साल पर्व के लिए बिहार लौटने वाले लोगों को यात्रा के दौरान बहुत परेशाानी होती है। बिहार आने वाले विमानों का किराया भी चरम पर है। 17 नवंबर के लिए दिल्ली से पटना का किराया 18555 रुपए तक व मुंबई से पटना का किराया 20777 रुपए तक पहुंच गया। इस दिन जितने पैसे में कोई व्यक्ति दिल्ली से पटना पहुंचेगा, उससे तीन हजार कम यानी 15077 में वह दुबई से दिल्ली चला आएगा। साफ है कि दुबई से दिल्ली का सफर चार घंटे का है जबकि दिल्ली से पटना का सफर महज डेढ़ घंटे का। दरअसल ट्रेनों के फुल होने का फायदा विमानन कंपनियां उठा रही हैं।