गर बात बिहार कि हो और महान लोक आस्था का महापर्व छठ की, तो बरबस ही औरंगाबाद के सूर्य नगरी की याद आनी बेहद लाजिमी है। हां हम बात कर रहे हैं उसी सूर्य नगरी देव की, जिसे भारत के छठे मुगल शासक मोहिउद्दीन मोहम्मद द्वारा तोड़ने के लिए पहुंचने पर मंदिर रातोंरात पूर्वाभिमुख की जगह पश्चिमाभिमुख हो गई। भारत का यह पहला मंदिर है जिसका मुख्य द्वारा पश्चिम दिशा में है। पश्चिमाभिमुख देव सूर्य मंदिर दवार्क मना जाता है जो श्रद्धालुओं के लिए सबसे ज्यादा फलदायी एवं मनोकामना पूर्ण करने वाला है। इस मंदिर की पौराणिकता, शिल्पकला और महत्ता विरासत में मिली है। यह प्राचीन मंदिर जहां अपनी भव्यता के लिए प्रसिद्ध है, वहीं आस्था का भी बहुत बड़ा केंद्र भी रहा है। इसी कारण प्रतिवर्ष यहां कार्तिक और चैत्र मास में होने वाले छठ में बहुत बड़ा मेला लगता है। यहां पर रहकर लोग छत्तीस घंटे का निर्जला उपवास रखकर सूर्य भगवान और छठी मइया की पूरी आस्था के साथ पूजा अर्चना करते हैं।

प्रचलित मान्यताओं के अनुसार इस सूर्य मंदिर का निर्माण स्वंय विश्वकर्मा ने किया है। इस मंदिर के बाहर देवताओं की भाषा संस्कृत में लिखे श्लोक के अनुसार, राजा इला पुत्र पुरुरवा ऐल ने 12 लाख 16 हजार वर्ष त्रेतायुग के गुजर जाने के बाद इस मंदिर का निर्माण प्रारंभ करवाया था। इस शिला लेख के अनुसार इस पौराणिक महत्ता वाले मंदिर का निर्माण काल 1 लाख 50 हजार 22 वर्ष पूरा हुआ था। किंवदंतियों के अनुसार मोहिउद्दीन मोहम्मद जिसे आलमगीर या औरंगजेब के नाम से जाना जाता था, पूरे भारत में मंदिर तोड़ते हुए औरंगाबाद के देव पहुंचा तो  पुजारियों ने इस मंदिर को नहीं तोडऩे की विनती की। औरंगजेब ने यह कहते हुए वहां से चला गया कि अगर तुम लोगों के भगवान में शक्ति है तो इसका दरवाजा पश्चिम की तरफ हो जाए।  पूजारी रात भर सूर्य भगवान से  प्रार्थना करते रहे। लोग बताते हैं कि अहले सुबह जब पुजारी मंदिर पहुंचे तो मुख्य द्वार पूर्व न होकर पश्चिमाभिमुख हो गया था। तब से देव सूर्य मंदिर का मुख्य द्वार पश्चिम तरफ में ही है। इसी  कारण छठ व्रत करने वाले लगभग सभी व्रतियों की एक अभिलाषा जरुर रहती है कि एक बार यहां आकर जरूर छठ करें।