देश के पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मी चरम पर है। राजस्थान, मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ में भाजपा का मुकाबला कांग्रेस से है, जबकि तेलंगाना में सत्तारूढ़ बीआरएस, कांग्रेस तथा भाजपा के बीच त्रिकोणीय मुकाबला है। मिजोरम में मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ), कांग्रेस तथा क्षेत्रीय पार्टी जोरम पीपुल्स मूवमेंट (जेडपीएम) का त्रिकोणीय संघर्ष है। 40 सदस्यीय मिजोरम विधानसभा में एमएनएफ के 26 विधायक थे। जेडपीएम के 8 तथा कांग्रेस के पांच विधायक थे। इस चुनाव में कांग्रेस एमएनएफ को सत्ता से बाहर करने के लिए पूरा जोर लगा रही है। पुरानी पेंशन व्यवस्था बहाल करने, गैस सिलेंडर में छूट तथा कैंसर जैसी बीमारी के इलाज में छूट जैसे मुद्दों पर मतदाताओं को रिझाने का प्रयास कर रही है।

एक लाख युवाओं को रोजगार देने का वादा भी कांग्रेस कर रही है। जेडपीएम पार्टी अपने को स्वतंत्र क्षेत्रीय दल बताकर मतदाताओं से वोट मांग रही है। जेडपीएम नेताओं का कहना है कि एमएनएफ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का हिस्सा होने के कारण राष्ट्रीय पार्टी के प्रभाव में है। उनका मानना है कि इस बार जेडपीएम ही सत्ता पर काबिज होगी। इसी तरह 90 सदस्यीय छत्तीसगढ़ विधानसभा के 20 विधानसभा सीटों पर मतदान के लिए तैयारी पूरी हो चुकी है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल कांग्रेस को दोबारा सत्ता में लाने के लिए पूरा जोर लगा रहे हैं। कांग्रेस हाई कमान भी छत्तीसगढ़ पर ध्यान केंद्रित किए हुए है। वहीं भाजपा कांग्रेस को शिकस्त देने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी छत्तीसगढ़ में धुआंधार प्रचार किया था। कांग्रेस की तरफ से मुख्यमंत्री भूपेश बघेल कांग्रेस का चेहरा है, जबकि भाजपा प्रधानमंत्री के चेहरे पर ही चुनाव लड़ रही है। मतदान के बाद ही परिणाम को देखकर पार्टी अंतिम निर्णय लेगी। रमन ङ्क्षसह को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाकर भाजपा कोई जोखिम नहीं लेना चाहती थी। अपनी बदली रणनीति के तहत भाजपा राजस्थान और मध्यप्रदेश में भी मुख्यमंत्री के उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है। वहां भी प्रधानमंत्री के चेहरे पर चुनाव लड़ा जा रहा है। इन दोनों राज्यों में भी कई केंद्रीय मंत्री एवं सांसद चुनावी मैदान में उतरे हैं। भाजपा किसी भी हालत में राजस्थान, मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ को गंवाना नहीं चाहती है।