महाभारत में पांडव कौरवों से जुए में सब कुछ हार गए थे। इस हार के बाद ये तय हुआ था कि पांडव जब 12 वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास करके लौटेंगे तब कौरव पांडवों को इनका राज्य वापस लौटा देंगे। पांडवों ने अपना वनवास और अज्ञातवास पूरा कर लिया तो वे अपना राज्य वापस मांगने कौरवों के पास पहुंचे, लेकिन दुर्योधन ने पांडवों को राज्य देने से मना कर दिया। बहुत कोशिशों के बाद भी दुर्योधन पांडवों को एक गांव तक देने के लिए तैयार नहीं हुआ। इसके बाद पांडवों के सामने सिर्फ युद्ध करने का एक मात्र उपाय बचा था। पांडवों ने युद्ध के लिए तैयार शुरू कर दी। कौरव सेना में भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण जैसे योद्धा थे।
विरोधी पक्ष में सभी पांडवों के रिश्तेदार ही थे। उनकी सेना बहुत बड़ी थी। पांडवों ने विचार किया कि हम तो सिर्फ पांच भाई ही हैं। हमारे पास सेना भी नहीं है, तो हम कौरवों की विशाल सेना का सामना कैसे करेंगे। श्रीकृष्ण ने पांडवों को समझाया कि कौरव पक्ष में भले ही बड़े-बड़े योद्धा हैं, लेकिन सभी के लिए मतभेद हैं। भीष्म कर्ण को पसंद नहीं करते, द्रोण दुर्योधन को पसंद नहीं करते। दुर्योधन भीष्म और द्रोण को अपमानित करते रहता है। जबकि आप पांचों भाई एक साथ हैं, आपके बीच एकता है। जहां एकता होती है, जीत भी वहीं होती है।
श्रीकृष्ण की सीख
श्रीकृष्ण ने संदेश दिया है कि जहां मतभेद होते हैं, वहां सफलता नहीं होती है। कौरव पक्ष में बड़े-बड़े योद्धा थे, विशाल सेना थी, लेकिन मतभेदों के चलते सभी एक मत होकर पांडवों से युद्ध नहीं लड़ सके और अंत में पांडवों की जीत हुई। अगर हम बड़े काम करना चाहते हैं तो हमें मतभेद दूर करके एकमत होकर काम करना चाहिए।