भारतीय संस्कृति के हिन्दू सनातन धर्म में मां भगवती काली की साधना प्रत्येक साधक उनकी शक्ति प्रदायिनी स्वरूप को ही लेकर करता है। धाॢमक आस्था एवं श्रद्धा व भक्तिभाव के साथ की गई पूजा से अलौकिक शान्ति तो प्राप्त होती ही है, साथ ही मनोकामना की पूॢत का भी सुयोग बनता है। इस दिन मां कालरात्रि की पूजा विधि-विधानपूर्वक करने का नियम है। भगवती काली का शक्ति स्वरूप अत्यन्त तेजस्विता एवं पूर्णतायुक्त है। उनके तेज को आत्मसातï् कर पाना प्रत्येक मनुष्य के वश की बात नहीं है, एक साधारण मनुष्य उनके भजन तो गा सकता है, उनकी भक्ति तो कर सकता है, लेकिन साधना करने की क्षमता सिर्फ साधकों में ही होती है। शारदीय नवरात्र में मां काली का भद्रकाली अवतार के रूप में माना गया है। नवरात्रि के सप्तम दिन नवदुर्गा के सप्तम रूप श्रीमहाकाली जी की पूजा-अर्चना का विशेष दिन है।
प्रख्यात ज्योतिषविद् विमल जैन ने बताया कि इस बार यह पर्व 21 अक्टूबर, शनिवार को मनाया जाएगा। आश्ïिवन शुक्लपक्ष की सप्तमी तिथि 20 अक्टूबर, शुक्रवार को रात्रि 11 बजकर 26 मिनट पर लगेगी जो कि 21 अक्टूबर, शनिवार की रात्रि 9 बजकर 54 मिनट तक रहेगी। पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र 20 अक्टूबर, शुक्रवार को रात्रि 8 बजकर 41 मिनट से 21 अक्टूबर, शनिवार को रात्रि । बजकर 54 मिनट तक रहेगा। सुकर्मा योग 20 अक्टूबर, शुक्रवार को रात्रिशेष 3 बजकर 02 मिनट से 21 अक्टूबर, शनिवार को अद्र्धरात्रि 12 बजकर 36 मिनट तक रहेगा। नवरात्रि में श्रीमहाकाली, श्रीमहासरस्वती व श्रीमहालक्ष्मी जी की पूजा-अर्चना करने का विधान है। आस्थावान भक्तजन अपने-अपने पारम्परिक व धाॢमक विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं। श्रीमहाकाली जी की पूजा-अर्चना से समस्त संकटों का निवारण होता है साथ ही ग्रहदोष से भी मुक्ति मिलती है। मां काली की पूजा में लाल चुनरी, अढ़उल के फूल की माला, ऋतुफल, नारियल, मेवा-मिष्ठïान्न आदि अर्पित कर शुद्ध देशी घी का दीपक प्रज्वलित करना चाहिए।
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