विशिष्ट तिथियों पर किए जाने वाले व्रत उपवास से मनोकामना की पूर्ति तो होती ही है साथ ही सुख-सौभाग्य में अभिवृद्धि भी होती है। भगवती श्रीमहालक्ष्मीजी की प्रसन्नता के लिए रखा जाने वाला श्रीमहालक्ष्मी व्रत 6 अक्टूबर, शुक्रवार को रखा जाएगा। ज्योतिषविद्  विमल जैन  ने बताया कि आश्विन कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन श्रीमहालक्ष्मी व्रत रखा जाता है। 23 सितम्बर, शनिवार से प्रारम्भ महालक्ष्मी व्रत का समापन आज के दिन 6 अक्टूबर, शुक्रवार को हो जाएगा। ज्योतिषविद् ने बताया कि पुत्र के आरोग्य व दीर्घायु के लिए महिलाएं जीवित्पुत्रिका व्रत रखती हैं। जीवित्पुत्रिका का व्रत वे महिलाएं भी रखती हैं, जिनके पुत्र जीवित नहीं रहते या अल्पायु रहते हों। धार्मिक-पारिवारिक रीति-रिवाज के अनुसार व्रत के प्रारम्भ में उड़द के साबूत दाने व्रती महिलाएं निगल कर व्रत प्रारम्भ करती हैं। इसके पश्चात् अन्न व जल कुछ भी ग्रहण नहीं किया जाता। यह व्रत आश्विन कृष्ण पक्ष की चन्द्रोदय व्यापिनी अष्टमी तिथि के दिन रखा जाता है। आश्विन कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 6 अक्टूबर, शुक्रवार को प्रातः 6 बजकर 35 मिनट पर लगेगी जो कि अगले दिन 7 अक्टूबर, शनिवार को प्रातः 8 बजकर 09 मिनट तक रहेगी। 6 अक्टूबर, शुक्रवार को श्रीमहालक्ष्मी व्रत एवं जीवित्पुत्रिका (जिउतिया) व्रत रखा जाएगा।

व्रत-पूजा का विधान :  ज्योतिषविद् विमल जैन ने बताया कि व्रत के दिन प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर अपने समस्त दैनिक कार्यों से निवृत्त हो स्वच्छ वस्त्र धारण कर अपने आराध्य देवी-देवता की पूजा-अर्चना करने के पश्चात् श्रीमहालक्ष्मी जी के व्रत का संकल्प लेना चाहिए। अपनी जीवनचर्या में पूर्ण शुचिता रखते हुए व्रत के प्रारम्भ में अष्टमी तिथि के दिन निराजल रहकर अपनी पारिवारिक परम्परा और धार्मिक मान्यता के अनुसार विधि-विधानपूर्वक लक्ष्मीजी की पूजा-अर्चना करने से सुख-समृद्धि का सुयोग बना रहता है। नवमी तिथि के दिन व्रत का पारण किया जाता है। महालक्ष्मी जी के व्रत के पारण के पश्चात् ब्राह्मण को भोजन करवाकर दान-दक्षिणा भी देना चाहिए।  श्री विमल जैन जी के अनुसार आश्विन कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन जीमूतवाहन की भी पूजा-अर्चना करने का विधान है। जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा भी सुनी जाती है। 

जिउतिया धारण करने का विधान : कच्चे सूत के साथ ही सोने व चांदी के भी जिउतिया बनते हैं। धागे का गण्डा बनाकर गण्डे की रोली-अक्षत से विधि-विधानपूर्वक पूजा की जाती है। व्रती महिलाएं जिउतिया का सूत्र पूजनोपरान्त अपने गले में धारण करती हैं। जिउतिया सोने या चांदी से भी बनवाया जाता है। जिउतिया लाल धागे के सूत्र में पुत्र की संख्या के अनुसार धारण किया जाता है। रक्षासूत्र के रूप में पुत्र को भी गले में जिउतिया धारण करवाया जाता है। सोलह दिन से चल रहे व्रत का पारण श्रीलक्ष्मीजी के दर्शन-पूजन के पश्चात् किया जाएगा। पुत्र के सौभाग्य एवं दीर्घायु के लिए जीवित्पुत्रिका व्रत अत्यन्त चमत्कारिक माना गया है। श्रद्धा आस्था व भक्तिभाव के साथ किए गए व्रत का फल शीघ्र ही मिलता है। श्रीमहालक्ष्मीजी के व्रत से जीवन में सुख-सौभाग्य में अभिवृद्धि के साथ ही धन, ऐश्वर्य व वैभव का मार्ग प्रशस्त होता है।

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