विदेश मंत्री एस जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक में कनाडा के साथ-साथ अमरीका सहित पश्चिमी देशों को भी आतंकवाद पर दोहरा रवैया अपनाने के लिए नसीहत दे दी। अपने संबोधन में जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों से आतंकवाद, चरमपंथ एवं हिंसा पर अपनी राजनीतिक सहूलियत के अनुसार प्रतिक्रिया नहीं देने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में राजनीति नहीं होनी चाहिए। जयशंकर के इस बयान को कनाडा पर कूटनीतिक हमला माना जा रहा है। उन्होंने कहा कि आतंकवाद, क्षेत्रीय अखंडता के प्रति सम्मान तथा अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप चुनिंदा तरीकों से नहीं की जा सकती। एक समय ऐसा था जब कुछ राष्ट्र एजेंडा तय करते थे जिस पर दुनिया के सभी देश अमल करते थे। अब समय बदल गया है। अब सभी देशों को अपनी सलाह देने का अधिकार है। भारत ने जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान एक पृथ्वी, एक परिवार एवं एक भविष्य के बैनर तले काम करने के लिए सकारात्मक संदेश दिया है। 55 देशों वाले अफ्रीकी संघ को जी-20 से जोड़ने का मकसद सभी के हितों की रक्षा करना है। सभी देशों की संप्रभुता का सम्मान होना चाहिए। आतंकवाद पर अलग-अलग नजरिया नहीं होना चाहिए।

जयशंकर ने परोक्ष रूप से अमरीका और चीन दोनों को आईना दिखाया है। कनाडा मामले में अमरीका की दोहरी भूमिका सामने आई है। एक तरफ अमरीका भारत का सच्चा सहयोगी होने का दावा करता है तो दूसरी तरफ खालिस्तानी मुद्दे पर कनाडा को खुफिया जानकारी देकर भारत के हितों के विरुद्ध काम करता है। भारत ने विभिन्न मंचों से भारत के प्रति कनाडा के साजिश का पर्दाफाश किया है। अमरीका के न्यूयार्क में कौंसिल ऑन फॉरेन रिलेशन विषय पर आयोजित सेमिनार को संबोधित करते हुए विदेश मंत्री ने कहा कि भारत के अनुरोध के बावजूद कनाडा में संगठित अपराध को बढ़ावा दिया गया। भारतीय राजनयिकों को धमकी दी गई, जो संयुक्त राष्ट्र के वियना समझौते का उल्लंघन है। श्रीलंका के विदेश मंत्री ने तो कनाडा को आतंकियों का पनाहगार बता दिया। अमरीका सहित कुछ पश्चिमी देश हरदीप सिंह निज्जर हत्याकांड के बहाने भारत पर दबाव बढ़ाना चाहते थे, लेकिन भारत ने उलटे उन देशों को बैक फुट पर धकेल दिया। क्षेत्रीय अखंडता एवं संप्रभुता का मुद्दा उठाकर सीधे-सीधे चीन को संदेश देने का प्रयास किया है कि अब उसकी दादागिरी नहीं चलने वाली है। जयशंकर ने इस मौके पर क्वाड, ब्रिक्स, आई टू, यू टू जैसे संगठनों की भूमिका को सराहते हुए भारत के योगदानों को याद दिलाया।

जयशंकर ने अपने संबोधन में अमरीका और पश्चिमी देशों को यह भी बता दिया कि पिछले 70 सालों से अमरीका-रूस, रूस-चीन तथा यूरोप-रूस के संबंधों में काफी उतार-चढ़ाव रहा है, किंतु भारत-रूस के संबंध लगातार स्थिर बने हुए हैं। इसका मतलब साफ है कि तमाम बदलावों के बावजूद भारत और रूस का संबंध आज भी चट्टान की तरह मजबूत है जिसका रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान उदाहरण मिल चुका है। आज भारत का 78 देशों के साथ साझेदारी है। उनका कहना था कि विकसित देशों को विकासशील देशों की जरुरतों पर ध्यान देना होगा। यह तभी संभव है जब हमलोग साझा लक्ष्य के साथ आगे बढ़ें। विकसित देशों को विकासशील देशों के हितों को ध्यान में रखना होगा। भारत ने जी-20 में अफ्रीकी संघ को शामिल कराकर बड़ा कूटनीतिक दांव खेला है, जिसका लाभ भारत को मिलेगा। अफ्रीकी देशों में प्राकृृतिक संसाधनों की भरमार है, किंतु उसके दोहन के लिए सुविधा नहीं है। भारत इस क्षेत्र में बहुत कुछ कर सकता है। जयशंकर ने अपने संबोधन में भारत को ग्लोबल साउथ का नेता बताकर विकासशील देशों को यह संदेश देने में सफल रहा है कि भारत उनका हितैषी है। खासकर कनाडा के मुद्दे पर जयशंकर ने कनाडा को पूरी तरह बेनकाब कर दिया। भारत की सफल कूटनीति के कारण कनाडा के सहयोगी देश भी उसके साथ खड़े होने से बचते नजर आये। भारत को आतंकवाद के मुद्दे पर खुद ही कमर कसनी होगी। यह काम नरेन्द्र मोदी सरकार बखूबी कर रही है।