हाल ही में कुदरत ने भारत के हिमाचल प्रदेश और लीबिया में बाढ़, भूकटाव और भूस्खलन के रूप में अपना जबरदस्त कहर बरपाया। हिमाचल में भारी बारिश के बाद बाढ़ और भूस्खसलन से करीब 75 लोगों की मौत हो गई, जबकि 7,500 करोड़ रुपए की संपत्ति तबाह हो गई। सिर्फ शिमला ही नहीं, हिमाचल प्रदेश के कई इलाकों में प्रकृृति का कहर देखा गया। कांगड़ा में भी बारिश के बाद पॉन्ग डैम का जलस्तर बढ़ने से बाढ़ जैसे हालात हो गए। यहां स्थिति संभालने और लोगों की मदद करने के लिए छह टीमों को तैनात किया गया। एयरफोर्स भी लोगों को एयरलिफ्ट करने में जुटी रही। बांध में जलस्तर बढ़ने की वजह से गांव से संपर्क टूट गया जिसके बाद कांगड़ा के निचले इलाकों से 800 से ज्यादा लोगों को निकाला गया। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने खुद कांगड़ा के फतेहपुर और इंदौरा में एरियल सर्वे कर हालात का जायजा लिया। उन्होंने ट्वीट कर बताया कि हमारी सरकार प्रभावित क्षेत्रों में त्वरित राहत और सहायता प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है। हम साथ मिलकर इस चुनौती से पार पाएंगे और मजबूती से पुनर्निर्माण करेंगे। यहां की भारी तबाही को देखते हुए इसे राष्ट्रीय संकट घोषित करने की मांग राज्य सरकार की ओर से की गई, परंतु केंद्र सरकार ने इसे स्वीकार नहीं किया।
दूसरी ओर बाढ़ पीड़ितों की सहायता के लिए मुख्यमंत्री सुक्खू मानवता की वह नजीर पेश की, जो बहुत कम ही देखे जाते हैं। उन्होंने अपनी 51 लाख की संपत्ति को बाढ़ पीड़ितों की सहायता के लिए दान कर दिया। दूसरी ओर भूमध्य सागर से उठे डैनियल तूफान ने लीबिया में हाल ही में भयंकर तबाही मचाई। इस तूफान की वजह से देश के दो बांध, अबू मंसूर और डेरना बांध टूट गए। विशेषज्ञों ने कहा कि हम वर्षों से इस बारे में चेतावनी दे रहे हैं। अगर बाढ़ आती है, तो यह निचले इलाके में रहने वाले लोगों के लिए विनाशकारी साबित होती है और यही हुआ। माना जाता है कि तूफान और बाढ़ की वजह से लीबिया में हजारों लोग मारे गए। 30,000 से ज्यादा लोग बेघर हो गए। संयुक्त राष्ट्र की मानवीय सहायता एजेंसी ओसीएचए ने लीबिया के दो अन्य बांधों को लेकर चिंता जताई है, लेकिन बांधों की मजबूती पर विरोधाभासी रिपोर्ट का उल्लेख किया गया है। बांधों की मजबूती को लेकर विरोधाभासी रिपोर्ट सिर्फ लीबिया ही नहीं, बल्कि अन्य देशों में भी सामने आई है। बांध जितना पुराना होता है उसकी नींव उतनी ही ज्यादा प्राकृृतिक गतिविधियों का अनुभव कर सकती है। इससे बांध के आसपास की ढलानें अस्थिर हो सकती हैं।
अगर निर्माण के दौरान इस्तेमाल की गई सामग्री नष्ट होने लगती हैं तो इससे रिसाव हो सकता है, वहीं भूकंप, बाढ़, चरम मौसम और भूस्खलन की वजह से भी बांध टूट सकते हैं। कभी-कभी युद्ध के दौरान बमबारी करके या जानबूझकर भी बांधों को तोड़ दिया जाता है। हालांकि, सबसे जरूरी यह है कि बांधों का नियमित तौर पर रख-रखाव होना चाहिए। समय-समय पर इंजीनियरों और विशेषज्ञों की सलाह के मुताबिक काम करते रहना चाहिए। साथ ही एक बेहतर रणनीति भी तैयार रखनी चाहिए कि अगर किसी वजह से बांध टूटता है तो उस परिस्थिति में तत्काल क्या कदम उठाए जा सकते हैं। लोगों को भी समय-समय पर जागरूक करना चाहिए कि अगर कभी ऐसा हादसा होता है, तो उन्हें क्या करना चाहिए। इन तमाम बातों के बीच यूएस फेडरल इमरजेंसी मैनेजमेंट एजेंसी (फेमा) का कहना है कि कोई भी बांध बाढ़ से सुरक्षित नहीं है। सनद रहे कि ब्राजील में मिना गेरियास में एक खनन बांध टूटने के बाद गलत रिपोर्ट देने के आरोप लगे थे।
जनवरी 2019 में यह बांध टूट गया और चारों ओर जहरीला मलबा फैल गया। इस घटना में 270 लोगों की मौत हो गई थी। उल्लेखनीय है कि मानव निर्मित बांध मुख्य रूप से दो तरह के होते हैं-तटबंध और कंक्रीट बांध। सबसे अहम बात है कि कभी-कभी बांध टूट जाते हैं और ओवरफ्लो होने लगते हैं। इससे विनाशकारी बाढ़ आ जाती है, हजारों लोगों की मौत हो जाती है और हर ओर तबाही का मंजर दिखने लगता है। इसलिए बांध की मजबूती और इसकी सुरक्षा पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। कारण कि इसके प्रति लापरवाही विनाश का प्रतीक है, जो ठीक नहीं है। विशाल बांध आर्थिक विकास को तेजी देते हैं, इसके साथ ही ये शान और ताकत का भी प्रतीक हैं। हालांकि एक बड़ा सवाल यह है कि नदी क्षेत्र के निचले हिस्से में रहने वालों का क्या होता है? इसके उदाहरण देखने हों तो हम असम के धेमाजी और लखीमपुर के निचले इलाके में रहने वालों को देख सकते हैं।