नरेन्द्र मोदी सरकार ने वर्ष 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले संसद के दोनों सदनों से 'नारी शक्ति वंदन' विधेयक पारित करवा कर मास्टर स्ट्रोक लगाया है। लोकसभा एवं राज्यसभा से पारित होने के बाद लोकसभा एवं विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का मार्ग प्रशस्त हो गया है। मोदी सरकार ने महिला आरक्षण विधेयक का नाम नारी शक्ति वंदन विधेयक रखा है। यह विधेयक दोनों सदनों से पारित होने के बावजूद महिलाओं को आरक्षण के लिए वर्ष 2029 तक के चुनाव का इंतजार करना होगा। इसका कारण यह है कि इस आरक्षण को लागू करने से पहले देश में जातीय जनगणना एवं परिसीमन का काम पूरा करना होगा। मालूम हो कि वर्ष 2021 में जातीय जनगणना का काम पूरा होना था, किंतु कोरोना के कारण यह काम संभव नहीं हो पाया। अत: जातीय जनगणना एवं परिसीमन का काम वर्ष 2026 से पहले पूरा होने की उम्मीद नहीं है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि सरकार इस बार संविधान के अनुसार आगे बढ़ रही है ताकि महिला आरक्षण के मार्ग में कोई रुकावट नहीं हो। लोकसभा ने भारी बहुमत से विधेयक को पारित कर दिया। लोकसभा में 456 सदस्यों में से 454 सांसदों ने पक्ष में मतदान किया, जबकि एआईएमआईएम के दो सांसदों ने इस विधेयक का विरोध किया।
लोकसभा में 60 सांसदों ने चर्चा में हिस्सा लिया, जिसमें 27 महिलाएं शामिल हैं। संसद में हुई चर्चा के दौरान विपक्षी पार्टी के सदस्यों के बीच महिला आरक्षण का श्रेय लेने की होड़ देखी गई। कई विपक्षी पार्टी के सदस्यों ने महिला आरक्षण में पिछड़े, अनुसूचित एवं अनुसूचित जनजाति के लिए अलग से आरक्षण की मांग की। महिला आरक्षण पर हुई चर्चा के दौरान भी जातिगत समीकरण का मुद्दा छाया रहा। लगभग 8 घंटे तक चली बहस के दौरान सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच कई बार नोकझोक की घटनाएं हुईं। अंत में लगभग सभी पाॢटयों ने एकजुटता दिखाई। राज्यसभा में भी कई घंटे की बहस के बाद विधेयक सर्वसम्मति से पारित हो गया। इसके पक्ष में 215 मत पड़े, जबकि विपक्ष में कोई वोट नहीं पड़ा। वर्ष 2010 में मनमोहन सरकार के शासनकाल में महिला आरक्षण विधेयक राज्यसभा से पारित हो गया था, किंतु लोकसभा में लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव, शरद यादव तथा कुछ अन्य नेताओं के विरोध के कारण विधेयक अटक गया।
इससे पहले 1996 में एचडी देवेगौड़ा, 1998 एवं 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में महिला आरक्षण विधेयक पारित करवाने का प्रयास किया गया था, जो सफल नहीं हो सका। 543 सदस्यीय लोकसभा में वर्ष 2019 में कुल 82 महिला सांसद चुनकर आईं हैं जो कुल संख्या का लगभग 15 प्रतिशत है। अगर महिला आरक्षण लागू हुआ तो लोकसभा में महिलाओं की संख्या 181 हो जाएगी। इसी तरह विधानसभाओं का स्वरूप भी बदलेगा। महिला आरक्षण लागू होने से विभिन्न पाॢटयों के बड़े-बड़े नेताओं की जमीन खिसकने का खतरा भी बढ़ेगा। स्थानीय निकायों में पहले से ही महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू है। वहां राजनेता आरक्षित सीटों पर अपनी पत्नी या परिवार के अन्य सदस्यों को निर्वाचित करवा कर पर्दे के पीछे से राजनीति करते हैं। ऐसी आशंका है कि कहीं यही कहानी लोकसभा एवं विधानसभाओं में भी न दोहरायी जाए। सरकार और विभिन्न राजनीतिक पाॢटयों को इसके प्रति सावधान रहना पड़ेगा, तभी जाकर महिला आरक्षण का वास्तविक उद्देश्य पूरा हो सकेगा। अभी देश में 43 करोड़ से ज्यादा महिला मतदाता हैं। महिला मतदाताओं को लुभाने के लिए सभी राजनीतिक पाॢटयां उनकी हितैषी बनने का भरसक प्रयास कर रही हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मध्यप्रदेश, राजस्थान एवं छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव तथा वर्ष 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव को लेकर जो बड़ा दांव खेला है उसका राजनीतिक लाभ अगले चुनाव में भाजपा को निश्चित रूप से मिलेगा।