अंग्रेज भारत आए तो थे व्यापारी बनकर किन्तु संग लाए थे दुर्नीति और साजिशों का लम्बा अनुभव। अंग्रेजों ने भारत की सत्ता तो हड़प ली लेकिन भारतीयों को गुलाम नहीं बना सके? कारण था- भारत की सदियों पुरानी गुरुकुल परम्परा, जो विद्यार्थियों को खगोल शास्त्र जैसे तमाम विज्ञान के अनेक गूढ़ विषयों के साथ-साथ संसार-देश-समाज और परिवार संबंधित सर्वोत्तम संस्कार देकर उन्हें सर्वरूपेण तराशने का काम कर रही थी। अंग्रेजों को यह सच्चाई रास नहीं आई। वे भारतीयों को मानसिक रूप से गुलाम बनाने की साजिश में जुट गए। इस उद्देश्य को पूरा करने की जिम्मेदारी वर्ष 1935 में लार्ड मैकाले को सौंपी गई। उसने पूरे भारत का शिक्षा संबंधी सर्वेक्षण कराया। अंग्रेज अधिकारी लिटनर, जिसने उत्तर भारत का सर्वे किया था, उसने बताया कि यहां 97 प्रतिशत साक्षरता है और मुनरो, जिसने दक्षिण भारत का सर्वे किया था, उसने बताया कि यहां तो 100 प्रतिशत साक्षरता है। 1850 तक इस देश में 7 लाख 32 हजार गुरुकुल हुआ करते थे और उस समय हमारे देश में गांव थे 7 लाख 50 हजार, मतलब हर गांव में औसतन एक गुरुकुल। ये सभी गुरुकुल आज की भाषा में ‘उच्च शिक्षा संस्थान’ हुआ करते थे। इनमें 18 विषय पढ़ाए जाते थे। इन गुरुकुलों में शिक्षा निःशुल्क दी जाती थी। ये गुरुकुल राजा-महाराजाओं की कृृपा पर नहीं बल्कि समाज के लोगों के सहयोग से चलते थे।
मैकाले ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि जब तक भारत की सुदृढ़ पारम्परिक गुरुकुल शिक्षा प्रणाली को पूरी तरह ध्वस्त नहीं किया जाएगा और उसकी जगह अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लागू नहीं की जाएगी, तब तक भारतीयों की मानसिकता को बदलना असंभव होगा। सरकार को भारत में अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लानी होगी। मैकाले ने लिखा था- ‘मेरा दृढ़ विश्वास है कि यदि हमारी शिक्षा की यह नीति सफल हो जाती है तो 30 वर्ष के अंदर बंगाल के उच्च घराने में एक भी मूर्तिपूजक नहीं बचेगा।’ 1858 में ‘भारतीय शिक्षा कानून’ बनाया गया जिसका मसौदा मैकाले ने ही बनाया था। इस नए शिक्षा कानून का एकमात्र मकसद था, भारतीयों पर अंग्रेजी द्वारा पाश्चात्य सभ्यता को थोपना ताकि हम अपनी भारतीय सभ्यता और संस्कृृति को तिरस्कार की दृष्टि से देखें और हमारे भीतर हीन भावना व्याप्त हो। इस कानून के तहत गुरुकुलों को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया। जब गुरुकुल गैरकानूनी हो गए तो उनको मिलने वाली सहायता जो कि समाज की तरफ से होती थी वो भी गैरकानूनी हो गई। फिर संस्कृत को गैरकानूनी घोषित किया गया और इस देश के गुरुकुलों को घूम-घूमकर ख़त्म कर दिया, उनमें आग लगा दी, उनमें पढ़ाने वाले गुरुओं को उसने मारा-पीटा गया, जेल में डाला गया।
इस तरह से सारे गुरुकुलों को ख़त्म किया गया और फिर अंग्रेजी शिक्षा को कानूनी घोषित किया गया। कलकत्ता में पहला कॉन्वेंट स्कूल खोला गया। उस समय इसे ‘फ्री स्कूल’ कहा जाता था। इसी कानून के तहत भारत में कलकत्ता यूनिवर्सिटी बनाई गई, बम्बई यूनिवर्सिटी बनाई गई, मद्रास यूनिवर्सिटी बनाई गई और ये तीनों गुलामी के ज़माने की यूनिवर्सिटी आज भी इस देश में हैं। मैकाले ने अपने पिता को एक चिट्ठी लिखी थी। बहुत मशहूर चिट्ठी है, जिसमें वो लिखता है कि ‘इन कॉन्वेंट स्कूलों से ऐसे बच्चे निकलेंगे जो देखने में तो भारतीय होंगे लेकिन दिमाग से अंग्रेज होंगे और इन्हें अपने देश के बारे में कुछ पता नहीं होगा। इनको अपने संस्कृति के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने परम्पराओं के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने मुहावरे नहीं मालूम होंगे, जब ऐसे बच्चे होंगे इस देश में तो अंग्रेज भले ही चले जाएं, इस देश से अंग्रेजियत नहीं जाएगी।’ उस समय लिखी चिट्ठी की सच्चाई इस देश में अब साफ़-साफ़ दिखाई दे रही है। क्या कभी हम स्वतंत्र भारतीय गुरुकुलों को उनका विनष्ट गौरव लौटने में अगुवाई कर पाएंगे? क्या हमारे नालन्दा जैसे विश्वविद्यालयों पुनः रौनक लौटेगी?