हमारे धर्मशास्त्रों में चार रात्रियों का विशेष महत्त्व बताया गया है। दीपावली जिसे कालरात्रि कहते है, शिवरात्रि महारात्रि है, होली अहोरात्रि है तो कृृष्ण जन्माष्टमी को मोहरात्रि कहा गया है। जिनके जन्म के संयोग मात्र से बंदीगृह के सभी बंधन स्वतः ही खुल गए, सभी पहरेदार घोर निद्रा में चले गए। मां यमुना जिनके चरण स्पर्श करने को आतुर हो उठीं,ऐसे भगवान श्रीकृृष्ण को मोह लेने वाला अवतार माना गया है। सनातन धर्म में श्रीकृृष्ण जन्माष्टमी का विशेष महत्व है। पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास के कृृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन भगवान श्रीकृृष्ण जन्मोत्सव पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस विशेष दिन पर रोहिणी नक्षत्र में भगवान श्रीकृृष्ण की उपासना करने से साधक को विशेष लाभ प्राप्त होता है।
प्रतिवर्ष भाद्रपद माह के कृृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाने वाला श्रीकृृष्ण जन्माष्टमी इस बार बेहद खास माना जा रहा है। पुराणों के अनुसार भगवान श्रीकृृष्ण का जन्म मध्यरात्रि व्यापनी अष्टमी तिथि और रोहणी नक्षत्र में हुआ था। इस वर्ष 6 सितम्बर को सर्वार्थ सिद्धि योग बन रहा है और चंद्रमा वृषभ राशि, रोहिणी नक्षत्र, बुधवार होने से एक विशेष योग 30 सालों बाद निर्मित हो रहा है। इसीलिए इस वर्ष श्री कृृष्ण जन्माष्टमी सुख, समृद्धि और मनोवांछित फल देने वाली मानी जा रही है। इस दिन लोग शालिग्राम, लड्डू गोपाल के रूप में उनकी पूजा करते हैं और कुछ व्रत उपवास रखकर श्रीकृृष्ण से विशेष प्रार्थना करते हैं। वहीं जन्माष्टमी के दिन श्रीकृृष्ण जी को छप्पन प्रकार के व्यंजनों का भोग लगाने की परंपरा भी है।
श्रीकृृष्ण को छप्पन भोग ही क्यों लगते हैं? दरअसल, इसके पीछे रोचक कथा जुड़ी है- सबसे प्रचलित कथा के अनुसार, मान्यता है कि माता यशोदा अपने बाल गोपाल को रोज आठ प्रहर मतलब दिन में 8 बार भोजन कराती थीं लेकिन जब श्रीकृृष्ण द्वारा गोवर्धन पूजा के कराए जाने पर देवराज इंद्र बृजवासियों से नाराज हो गए थे तो उन्होंने क्रोध में खूब वर्षा बरसाई थी ताकि बृजवासी माफी मांगने पर मजबूर हो जाए लेकिन बृज वासियों की रक्षा के लिए श्रीकृृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठाया और सभी बृज वासियों को इसी पर्वत के नीचे आने को कहा। कथा है कि श्रीकृृष्ण ने 7 दिनों तक बिना खाए-पिए गोवर्धन पर्वत को उठाए रखा। जब इंद्र को अपनी भूल का अहसास हुआ तो उन्होंने खुद क्षमा मांगी। सातवें दिन जब बारिश रूकी तो उनकी मां यशोदा ने बृजवासियों संग मिलकर उन्होंने 7 दिनों के 8 पहर के हिसाब से कान्हा के लिए छप्पन भोग बनाए थे। तभी से श्रीकृृष्ण की पूजा में उन्हें छप्पन व्यंजनों का महाभोग लगाने की परंपरा है।