भारतीय संस्कृति के सनातन धर्म में भगवान् शिवजी की महिमा अनंत है। तैंतीस कोटि देवी-देवताओं में भगवान शिवजी को देवाधिदेव महादेव माना गया है। भगवान शिवजी की विशेष कृपा-प्राप्ति के लिए शिवपुराण में विविध व्रतों का उल्लेख है, जिसमें श्रावण मास के सोमवार का व्रत प्रमुख हैं। श्रावण मास के सभी सोमवार को व्रत रखकर भगवान शिवजी की पूजा-अर्चना की जाती है। प्रख्यात ज्योतिषविद् विमल जैन ने बताया कि इस बार द्वितीय (अधिक) श्रावण मास का षष्ठम् सोमवार, 14 अगस्त को पड़ रहा है। इस दिन मास शिवरात्रि व्रत होने से श्रावण मास का सोमवार व्रत-पूजा के लिए अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।
इस दिन पुष्य नक्षत्र का भी अनुपम संयोग बन रहा है। सोमवार, 14 अगस्त को दिन में 11 बजकर 07 मिनट से मंगलवार, 15 अगस्त को दिन में 1 बजकर 59 मिनट तक रहेगा। जो भक्तगण अधिक मास के किसी भी सोमवार को व्रत न कर पाएं हों, उन्हें अधिक मास के अंतिम सोमवार को यह व्रत करके लाभ उठा सकते हैं। श्रावण मास में पार्थिव शिवलिंग की पूजा का विशेष महत्व है। पार्थिव शिवलिंग स्वच्छ मिट्टी, गंगालजल से निर्मित करके विधि-विधानपूर्वक पूजा किया जाता है। श्रावण मास में शिवभक्त अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए कांवड़ यात्रा करके भगवान शिवजी को जल अर्पण के साथ ही पूजा-अर्चना करते हैं, जिससे भक्तों को भगवान शिवजी के आशीर्वाद से विशेष कृपा-प्रसाद मिलता है।
पूजा का विधान : ज्योतिषविद् ने बताया कि व्रतकर्ता को प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर समस्त दैनिक कृत्यों से निवृत्त हो स्नानकर स्वच्छ वस्त्र धारण करके अपने आराध्य देवी-देवता की पूजा-अर्चना करनी चाहिए। तत्पश्चात् अपने दाहिने हाथ में जल, पुष्प, फल, गन्ध व कुश लेकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए। शिवभक्त अपने मस्तक पर भस्म व तिलक लगाकर शिवजी की पूजा करें तो पूजा शीघ्र फलित होती है। सम्पूर्ण दिन निराहार रहते हुए सायंकाल पुनः स्नान कर स्वच्छ व धारण करके पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख होकर भगवान शिवजी की विधि-विधान पूर्वक पूजा की जाती है।
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