आमतौर पर यूसीसी के बारे में सुनकर अच्छा लगता है, परंतु इसको भारत जैसे देश में धरातल पर उतारना आसान नहीं है जहां अलग-अलग धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृृतिक विविधताएं मौजूद हैं  और खान-पान, शादी-विवाह और पहनावा अलग-अलग हैं। कई धर्म और समाज की अलग-अलग मान्यताएं और पर्सनल लॉ हैं, इस परिस्थिति में यूसीसी को लागू कराना आसान नहीं होगा, इसलिए इसका विरोध स्वाभाविक है। भारत में 2024 में आम चुनाव होने वाले हैं और समान नागरिक संहिता (यूसीसी)का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। दरअसल, परिवार और उत्तराधिकार जैसे मामलों के लिए देश में अलग-अलग धार्मिक समूहों को अपने हिसाब से नियमों और कानूनों का पालन करने की अनुमति है। वर्तमान केंद्र सरकार अब सभी धर्मों के लिए समान नागरिक संहिता लागू कर सकती है। इसी बीच कई मुस्लिम महिलाएं भी इस कानून को लागू करने की मांग करती देखी और सुनी जा रही हैं। उन्हें लगता है कि नया कानून लागू होने से उनके समुदाय को पुराने और पितृसत्तात्मक व्यक्तिगत कानूनों को खत्म करने में मदद मिलेगी। उल्लेखनीय है कि अगर इस कानून से समानता आती है तो यह महिलाओं के लिए फायदेमंद होगा। साथ ही यूसीसी से लैंगिक भेदभाव खत्म होगा।

दूसरी ओर यूसीसी के तहत लैंगिक न्याय और समानता को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। भाजपा समर्थक लोगों का तर्क है कि जब नेताओं ने यूसीसी की परिकल्पना की थी, तब उनके मन में भारतीय महिलाओं के अधिकारों के बारे में चिंताएं सबसे ऊपर थीं। यह कानून लैंगिक तौर पर हो रहे भेदभाव को जड़ से खत्म करने और सभी को न्याय दिलाने वाला होना चाहिए। यूसीसी व्यक्तिगत कानूनों का एक सेट है जो धर्म, लिंग या यौन रुझान की परवाह किए बिना सभी भारतीय नागरिकों के लिए एक समान होगा, इससे व्यक्तिगत कानूनों के तहत ही विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और विरासत जैसे मामलों को नियंत्रित किया जाता है। मौजूदा व्यवस्था के तहत महिलाओं को अकसर भेदभाव का सामना करना पड़ता है। ऐसा अलग-अलग धार्मिक समुदायों के लिए बने व्यक्तिगत कानूनों की वजह से होता है। यूसीसी उन कानूनों को देश के आपराधिक कानून के बराबर लाएगा, जो पहले से ही सभी पर लागू होता है। 1947 में भारत की आजादी के बाद से इस अवधारणा की कई बार कल्पना की गई, लेकिन इसे लागू नहीं किया गया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले महीने इस बात पर फिर से चर्चा शुरू की है, जिसमें कहा गया है कि अलग-अलग समुदायों के लिए अलग कानून नहीं होने चाहिए।  हालांकि, 1.4 अरब की आबादी वाले देश में कई धार्मिक और जातीय समूह हैं और सभी के लिए एक समान कानून लागू करना आसान नहीं होगा। यूसीसी के समर्थकों का कहना है कि इससे समानता को बढ़ावा मिलेगा, जबकि इसके आलोचकों का कहना है कि इससे धर्म और संस्कृति के हिसाब से जीने की आजादी खत्म हो सकती है। सबसे ज्यादा विरोध मुस्लिम समुदाय की ओर से हो रहा है। भारत में मुसलमानों की आबादी करीब 20 करोड़ है और उनमें से कई लोगों को लगता है कि यूसीसी से उनके धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार पर असर पड़ेगा। गैर-सरकारी संगठन ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का कहना है कि इस कानून के लागू होने से मुसलमानों की पहचान खो सकती है।  यह संगठन मुसलमानों के लिए शरिया कानून की वकालत करता है। हालांकि, मुस्लिम बहुल देशों में भी धार्मिक कानून की अलग-अलग तरीके से व्याख्या की गई है। भारत में शरिया कानून की पितृसत्तात्मक व्याख्या का खामियाजा मुस्लिम महिलाओं को भुगतना पड़ा है। विशेषज्ञों का कहना है कि पितृसत्तात्मक व्याख्या की वजह से महिलाओं को वे अधिकार नहीं मिल पाते जिससे वे सशक्त बन सकें। कुल मिलाकर यूसीसी को लेकर अलग-अलग मंचों से अलग-अलग बातें कही जा रही हैं। इसलिए सबकी सुनने और इस पर आम सहमति बनाने के बाद ही इसे लागू करना सही होगा,अन्यथा सरकार को कई तरह के विरोध का सामना करना पड़ेगा।