सनातन धर्म में तैंतीस कोटि देवी-देवताओं में भगवान शिव देवाधिदेव महादेव की उपमा से अलंकृत हैं। भगवान शिवजी की पूजा-अर्चना हर आस्थावान धर्मावलम्बी अपनी मनोकामना की पूॢत एवं पुण्य अॢजत करने के लिए करते हैं। भगवान शिवजी की विशेष कृपा प्राप्त करने के लिए शिवपुराण में विविध व्रतों का उल्लेख है। जिनमें प्रदोष व्रत प्रमुख है। प्रदोष व्रत प्रदोष व्यापिनी त्रयोदशी तिथि के दिन किया जाता है। सूर्यास्त और रात्रि के संधिकाल को प्रदोष बेला कहते हैं। प्रदोष बेला की अवधि दो या तीन घटी मानी गई है, एक घटी 24 मिनट की होती है।
प्रख्यात ज्योतिषविद् विमल जैन ने बताया कि द्वितीय (अधिक) श्रावण मास के कृष्णपक्ष की त्रयोदशी तिथि 13 अगस्त, रविवार को प्रात: 8 बजकर 20 मिनट पर लगेगी जो कि अगले दिन 14 अगस्त, सोमवार को प्रात: 10 बजकर 26 मिनट तक रहेगी। प्रदोष वेला में त्रयोदशी तिथि का मान 13 अगस्त, रविवार को होने के फलस्वरूप प्रदोष व्रत इसी दिन रखा जाएगा। वार के अनुसार प्रदोष व्रत के लाभ : ज्योतिषविद् ने बताया कि प्रत्येक दिन के प्रदोष व्रत का अलग-अलग महत्त्व है।
जैसे-रवि प्रदोष-आयु, आरोग्य, सुख-समृद्धि, सोम प्रदोष-शान्ति एवं रक्षा, भौम प्रदोष-कर्ज से मुक्ति, बुध प्रदोष-मनोकामना की पूॢत, गुरु प्रदोष-विजय व लक्ष्य की प्राप्ति, शुक्र प्रदोष-आरोग्य, सौभाग्य एवं मनोकामना की पूॢत, शनि प्रदोष-पुत्र सुख की प्राप्ति। अभीष्ट की पूॢत के लिए 11 प्रदोष व्रत या वर्ष के समस्त त्रयोदशी तिथियों का व्रत अथवा मनोकामना पूॢत होने तक प्रदोष व्रत रखने का विधान है। कलियुग में भगवान शिवजी की आराधना के लिए किए जाने वाला प्रदोष व्रत अत्यंत चमत्कारिक बतलाया है। प्रदोष व्रत से जीवन के समस्त दोषों का शमन होता है तथा सौभाग्य में अभिवृद्धि होती है।
समस्याओं के समाधान एवं जन्मकुण्डली में उपस्थित ग्रहजनित दोषों के निवारण हेतु भी प्रदोष व्रत किया जाता है। प्रदोष व्रत किस प्रकार करें? : ज्योतिषविद् ने बताया कि व्रतकर्ता को प्रात:काल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर अपने समस्त दैनिक कृत्यों से निवृत्त होना चाहिए। प्रथम पूज्य भगवान श्रीगणेश जी का स्मरण करके अपने इष्ट देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना के पश्चात् भगवान् शिवजी की प्रसन्नता के लिए प्रदोष व्रत का संकल्प लेना चाहिए।
दिनभर निराहार रहते हुए सायंकाल पुन: स्नान करके यथासंभव धुले हुए या स्वच्छ वस्त्र धारण कर प्रदोष काल में श्रद्धा भक्ति व आस्था के साथ भगवान शिवजी की विधि-विधान पूर्वक पंचोपचार, दशोपचार अथवा षोडशोपचार पूजा-अर्चना करनी चाहिए। भगवान शिवजी का जलाभिषेक करके उन्हें वस्त्र, यज्ञोपवीत, आभूषण, सुगंधित द्रव्य के साथ बेलपत्र, कनेर, धतूरा, मदार, ऋतुपुष्प, ऋतुफल, नैवेद्य आदि अॢपत करके धूप-दीप के साथ पूजा-अर्चना पूर्व दिशा या उत्तर दिशा की ओर मुख करके करनी चाहिए।