भारतीय संस्कृति के सनातन धर्म में हिन्दू धर्मशास्ïत्रों के अनुसार तैंतीस कोटि देवी-देवताओं में भगवान शिवजी देवाधिदेव महादेव की उपमा से अलंकृत हैं। भगवान शिवजी की विशेष कृपा-प्राप्ति के लिए शिवपुराण में विविध व्रतों का उल्लेख है, जिसमें श्रावण मास के सोमवार का व्रत प्रमुख हैं। इस बार दो श्रावण मास (अधिक मास) के होने के कारण कुल आठ सोमवार के व्रत का योग बन रहा है। श्रावण मास के सभी सोमवार को व्रत रखा जाता है। प्रख्यात ज्योतिषविद् विमल जैन ने बताया कि इस बार प्रथम (अधिक) श्रावण मास का चतुर्थ सोमवार 31 जुलाई को पड़ रहा है।
श्रावण मास में प्रदोष व्रत, शिव चतुर्दशी के व्रत की भी विशेष महिमा है। श्रावण मास में स्वच्छ मिट्टी, गंगाजल से पाॢथव शिवलिंग निर्माण कर विधि-विधानपूर्वक पूजा किया जाता है। वैसे तो कभी भी भगवान शिवजी की पूजा की जा सकती है। इन दिनों शिवालय में नियमित रूप से दर्शन-पूजन करना भी लाभकारी रहता है। लेकिन सोमवार के साथ ही अधिक मास के श्रावण की सोमवार को की गई पूजा विशेष फलीभूत होती है। श्रावण मास में शिवभक्त कांवड़ यात्रा करके भगवान शिवजी को जलाॢपत कर उनकी पूजा-अर्चना करते हैं, जिससे देवाधिदेव महादेव अपने भक्तों को श्रावण के पावन महिने में अपनी कृपा-प्रसाद से सराबोर कर देते हैं।
श्रावण मास में अधिक मास पडऩे के कारण श्रीपुरुषोत्तम भगवान का दर्शन-पूजन कर उन्हें 33 मालपुआ अॢपत करने का विधान है। ऐसे होगी शिवजी की पूजा—ज्योतिषविद् श्री विमल जैन ने बताया कि व्रतकर्ता को प्रात:काल सूर्योदय के समय ब्रह्ममुहूर्त में उठकर समस्त दैनिक कृत्यों से निवृत्त हो स्नानकर स्वच्छ वस्ïत्र धारण करके अपने आराध्य देवी-देवता की पूजा-अर्चना करनी चाहिए। तत्पश्चात् अपने दाहिने हाथ में जल, पुष्प, फल, गन्ध व कुश लेकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए। सम्पूर्ण दिन निराहार रहते हुए सायंकाल पुन: स्नान कर स्वच्छ व धारण करके पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख होकर भगवान शिवजी की विधि-विधान पूर्वक पूजा करनी चाहिए।
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